काले हैं तो क्या हुआ, दिल वाले हैं ---





इस दिल को चबा लो, भूनो या उबाल लो। चाहो सब्जी बना लो या चक्की में पीस लो।

...कुदरत की अनुपम रचना है। इस दिल की बड़ी हिफाजत है। प्रकृति ने सख्त परत पर दो नुकीले सींग नुमा कांटे उगा दिए। पकने पर इसका रंग काला कर दिया। इसे न जानवर खा सकते, न नफीस इसके पास फटक सकते। लिहाजा यह फल मेहनती गरीब जातियों के लिए आरक्षित बना रहा।

...फेफड़े की आकृति समान इस गिरि (कम्द) को पाना आसान न था। बरसात के बाद ठहरे पानी के तालाब इस लता से भर जाते। बेल पर सांप भी लिपटे रहते। बच्चे-बूढ़े छोटी-छोटी नावें बनाकर गंदले पानी में घुसे रहते। फल तोडऩे में बैल के सींग सरीखे दो कांटे हाथों को चीरते रहते। उबालने पर बर्तन कुरूप हो जाते, काला पानी जमीन पर दाग छोड़ देता। छिलकों का ढेर मक्खी-कीड़ों का घर बन जाता। इस मेहनत के बाद फल के भीतर से निकला छोटा सा दिल मानव शरीर को पुष्ट कर देता।

...चीन में सिंघाड़ा नाम का यह फल प्रिय व्यंजनों का हिस्सा बन गया, इसकी पैदावार बड़े पैमाने पर होने लगी। चाइना इसका निर्यातक हो गया, भारत में यह उपेक्षित बना रहा। गरीब परिवार सितंबर से जनवरी तक पोखरों से सिंघाड़े एकत्र करते। फल के बीज को कुछ कच्चा चबा लेते, सब्जी बनाते या उबाल कर खा लिया करते। बच गए तो सुगंधित गिरि को पीस कर आटा बनाते और सालभर इसकी रोटी खाते।

...कालांतर में इस फल को आदिवासियों और दमित जातियों के हाथ से छीनने की कोशिशें हुई। तालाब दबंगों ने कब्जे में ले लिए। सवर्ण चोरी-छिपे सिंघाड़े खाने लगे। फिर चतुर पुरोहितों ने इसे शुद्ध ठहराया और कहानियां गढ़ कर व्रत-पूजा में कुटू के आटे का महात्यम समझाना शुरू किया। सदियों श्यामल फल से दूरी रखने वाले ठाकुर-पंडित कुटू के आटे की पूड़ी-कचौड़ी और पकौड़ी चाव से खाने लगे। इस आटे के हर व्यंजन को फल मानकर व्रती पेट भरने लगे। फिर भी इसे महत्व कम मिला। हाल के सालों में जलीय कमल राजनीति के फेर में नाम कमा गया पर सिंघाड़ा अपने हाल पड़ा रहा।

...शृंगाटक ( Eleocharis dulcis) नामक यह फल मानव शरीर के लिए संपूर्ण अहार है। कृषि विज्ञानी बताते हैं, यह जलीय फल दूध से 22 फीसदी अधिक पौष्टिक है। इसमें 75 फीसद जटिल कार्बोहाइड्रेट्स और 25 फीसद उच्च गुणवत्ता वाला प्रोटीन होता है। यह सैचुरेटेड फैट और कोलेस्ट्रोल मुक्त होता है और बड़ी मात्रा में फाइबर पाया जाता है। इसमें आयोडीन, मैग्नीशियम और आयरन भी होता है। इसमें कई रोग निवारक गुण भी होते हैं।



..अर्थतंत्र में जब गांवों की बात होगी, सत्ता मानवहित की सोचेगी

तब स्वस्थ दिमाग और खुशहाल समाज कुदरत की देन पहचानेंगे..