आस्माँ जैसे वकील साथियों का एहसान शायद वो परिवार और वो लड़का कभी नही चुका पाएगा...

15साल की उम्र ही कितनी होती है.... शायद हमारी भी यही उम्र थी जब मुलायम सिंघ यादव ने घोषणा करी कि पावर प्लांट्स प्रायवेट पूजीपतियों को बेचे जाएँगे.... हमारा पूरा का पूरा शहर ही पावर प्लांट पे आश्रित था.... फ़ौरन हड़ताल हो गयी... प्रडक्शन आर्मी ने सम्भाला और शहर PAC ने....



हम भी बाक़ायदा अपने-अपने पपाओं के साथ मशाल जुलूस में जाया करते थे.... बच्चों को पता चल चुका था कि ये आर्मी और फ़ौज पपाओं की नौकरियाँ खाने आयी है, तो बच्चे जहाँ किसी वर्दीधारी को देखते पत्थर मारके भाग जाते, वो भी बेचारे डाँटते डपटते या कई बार तो शरारत समझ हंस भी देते



हसनैन घर से चीनी लेने दुकान पर गया था. अचानक पुलिस की एक गाड़ी पीछे से आयी और उसे उठा ले गयी.... घर पे परिवार रात तक इंटेज़ार करता रहा कि बच्चा कहाँ गया... रात कुछ NRC प्रोटेस्ट से जुड़े वकीलों ने घर ढूँढ उन्हें ख़बर पहुँचायी कि आपका लड़का NRC प्रोटेस्ट में गिरफ़्तार हो गया है...



दरअसल दो दिन पहले लखनऊ में NRC के ख़िलाफ़ प्रदर्शन हुआ था, जिसमें पुलिस पर पथराव भी हुआ था... हसनैन को दो दिन बाद पुलिस ने सिर्फ़ इसलिए धार दबोचा कि एक CCTV फ़ुटेज में एक उसी उमर का लड़का लाल जैकेट पहने पुलिस पे पत्थर चला रहा था.... और हसनैन लाल जैकेट पहन चीनी ख़रीदने निकला था तो केस सोल्व



मेरे लिए UP पुलिस की इन नौटंकियों से ज़्यादा इमपोर्टेंट हैं लड़के की उम्र... जी वही उम्र जब हम सच में मशाल जुलूसों में जाया करते थे, जब हम सच में पत्थर मार भाग करते थे.... हाँ ये तो डर रहता था कि कोई थप्पड़ मार देगा, लेकिन ये कभे ख़्वाबों ख़यालों में भी न सोच सकते थे कि कूई जेल में भी डाल देगा....



पंद्रह साल का हसनैन जेल में डाल दिया जाता है, ग़रीब माँ-बाप ठोकरें खाते रहते हैं.... जब मैं लॉकडाउन में लखनऊ पहचा तो पहली बार पता चला के पिछले पाँच महीनो से वो लड़का बेगुनाह जेल में पड़ा हुआ है.... फिर जेल से ही उसने हाई स्कूल की परीक्षा दी और और बहुत अच्छे नम्बरों से पास हुआ. जेल में ही वो कोरोना ग्रस्त हो गया और अस्पताल में ज़िंदगी मौत से जूझता रहा... एक समय वो भी आया जब उसने बाप से कहा कि मैं क़त्ल का भी जुर्म क़ुबूल करने को तय्यार हूँ पापा, बस अब यहाँ और नही रहना मुझे




Abdullah Sher Khan

और
Rafat Fatima

ने परिवार की काफ़ी मदद की. फिर
Shubham Tiwari

ने मुझे
Ashma Izzat

से मिलाया... जी, वही आसमा इज़्ज़त जिन्होंने एक रिक्शे वाले को कुड़की से बचाया था.... आस्माँ ने इस केस को लेने का फ़ैसला किया और वो भी बिना किसी फ़ीस के.....



और आज वो लड़का दस महीने बाद ज़मानत पे रिहा हो रहा है....



आस्माँ जैसे वकील साथियों का एहसान शायद वो परिवार और वो लड़का कभी नही चुका पाएगा.... लेकिन मैं बार-बार यही सोच रहा हूँ, कि पत्थर मार के भागते वक़्त या, किसी और के शक में कहीं मुझे पंद्रह साल की उम्र में जेल में डाला गया होता, तो क्या मैं जैसा आज हूँ, वैसा ही होता???? क्या असर पड़ता मेरे मासनिक विकास पे???