अपराध और अपराधियों का महिमामंडन-कानपुर एनकाउंटर

                       कानपुर एनकाउंटर


अपराध की दुनिया से मुझे घिन आती। क्राइम रिपोर्टिंग को लेकर मैं कभी भी सहज नहीं रहा। मुझे क्राइम आधारित सीरियल, फिल्म व वेब सिरीज भी नहीं पसंद है। कल सुबह जनचौक के संपादक के आग्रह पर मुझे कानपुर वाली घटना पर लिखना पड़ा। ख़ैर।


लेकिन हाँ एक समय था जब मैं छात्र था, मुझमें राजनीतिक चेतना और मानवीय मूल्यों का इतना विकास नहीं हुआ था। सन तो ठीक-ठाक नहीं याद है पर उस समय टीवी चैनलों पर छोटा राजन के फोनकॉल आते थे और वो आधे आधे घंटे लाइव टीवी पर एंकरों से बतियाता था। टीवी चैनल उसे ‘हिंदू डॉन’ कहकर पेश करते थे जो लाइव टीवी पर ऐलान करता था कि वो भारत के दुश्मन मुंबई सीरियल बम ब्लास्ट के आरोपी ‘दाऊद इब्राहिम’ को अपने हाथों गोलियों से भूनकर सैंकड़ों हिंदू भाइयों की मौत का बदला लेगा।


इस कार्यक्रम के देखने के बाद मेरे मन में माफिया छोटा राजन के प्रति सहानुभूति और लगाव पैदाव हुआ। ये मीडिया ने किया। मीडिया ने ‘मुस्लिम माफिया’ के विरुद्ध ‘हिंदू माफिया’ का नैरेटिव रचा। और मेरे जैसे जाने कितने युवा जो उस कार्यक्रम के देख रहे थे इस नैरेटिव के जाल में फँस गए। 


तो मैं ये कह रहा था कि क्राइम रिपोर्टिंग की तमीज़ भारतीय मीडिया में नहीं है कम से कम हिंदी भाषी मीडिया में तो कतई नहीं है। न भाषा के स्तर से, न सामाजिक मनोविज्ञान के लिहाज से, न ही मानवीय संवेदना के लिहाज़ से।


कल से देख रहा हूँ तमाम मीडिया संस्थान विकास दुबे के आतंकी प्रभाव के लिए ‘जुर्म की सल्तनत’ लिखकर दक्षिणपंथी एजेंडे को बढ़ाने में लगे हैं। मानो धरती के सारे जुर्म़ सल्तनत काल में ही होते हों।


इसके अलावा रहस्य और सनसनी का ऐसा मकड़जाल बुना गया है कल से आज तक कि करोड़ों युवा दिमाग उसी में चकरघिन्नी खा रहे हैं। बस एक कसर रह गई है विकास दुबे मामले में किसी महिला का नाम नहीं जुड़ने से सेक्स फैंटेसी छूट गई। जाने कैसे एंगल पर चूक रही है। वर्ना ख़बरें और चटखारेदार बनतीं, ख़ैर।


बीबीसी हिंदी के लिए समीरात्मज मिश्र की एक वीडियो रिपोर्ट है, रिपोर्ट में जिस तरह की सम्मानित भाषा का इस्तेमाल किया गया है विकास दूबे के लिए कि पूरा वीडियो सुनने पर एक सम्मोहन सा जगता है।



वहीं एनडीटीवी के लिए आलोक पांडेय की एक रिपोर्ट की हेडलाइन है- “ कानपुर: यूपी पुलिस के आठ लोगों की हत्या करने वाला विकास दुबे कैसे बना अगड़ों की राजनीति का ‘हथियार’ जानें History Sheet” और फिर इस आर्टिकल में उसे पिछड़ी जातियों के वर्चस्व को खत्म करने के लिए विकास दुबे को उभारा गया बताया गया है।


जबकि विकास दुबे ने जितनी भी हाई प्रोफाइल हत्याएं की हैं उनमें से लगभग सभी सवर्ण थे। और ये बात भी साफ है कि प्रदेश में जिसकी सरकार रही है विकास दुबे उसके साथ रहा है। फिर जबर्दस्ती जातिवादी एजेंडे को मैनिपुलेट करने का क्या मतलब है? एनडीटीवी खुद को दूसरों से अलग दिखाने के फेर में इस तरह की चीजें मैनिपुलेट कर रहा है।  


https://khabar.ndtv.com/news/crime/8-people-of-up-police-killed-in-kanpur-history-sheet-of-vikas-dubey-2256288/amp/1?akamai-rum=off&__twitter_impression=true


जौनपुर के माफिया रोमेश शर्मा की जब गिरफ्तारी हुई थी तब हमारे यहाँ माने गांव तक केबल नेटवर्क नहीं था। न ही, अख़बार पढ़ने लायक तब हम थे। लेकिन हम लोगों तक ये खबर सनसनीखेज और रहस्यमई तरीके से पहुँची औऱ उन लोगों तक भी मीडिया ने ही पहुँचाया था। जबकि कुंडा के राजा भैया की गिरफ्तारी के समय उनसे जुड़ी रहस्यमई बातें, उनके बेताज बादशाह वाले रुतबे के गुणगान टीवी और अखबारों से हम तक यूँ पहुँचाया कि सुनने वाला स्वतः ही उनके प्रभाव में आ जाए। 


और सबसे बड़ी बात कि ये सारे रहस्य, रोमांच और बेताज बादशाह वाले तमगे सवर्ण माफियाओं और आतंकियों से जोड़कर ही रचे गए थे। दूसरे वर्गों या जातियों के साथ ये नहीं जुड़ते थे। सवर्ण मीडिया सवर्ण आतंकियों के अपराधों की कथा सुनाता है तो उसे सत्य नारायण कथा की तरह सुनाता है जहाँ चित भी उनकी और पट भी उनकी होती थी। 


मीडिया उनकी क्रूरता उनकी हत्याओं को ग्लोरीफाई करके उनके आतंक को उनकी सत्ता और उनके द्वारा लूट-पाट से अर्जित संपत्ति को उनका वैभव बताकर पेश करता आया है। यही कारण है कि सवर्ण आतंकियों की बर्बरता की कहानी जब टीवी से लेकर अख़बार तक में चलते हैं तो सारे ज्वलंत मुद्दे पीछे छूट जाते हैं या ढँक जाते हैं। अब कुछ दिन इस देश की अवाम की मनोचेतना को विकास दुबे के आतंकी-वैभव से इस तरह डायवर्ट कर दिया जाएगा कि गलवान घाटी संघर्ष, कोरोना के खिलाफ़ सरकार की नाकामी, भुखमरी, बिना इलाज हो रही मौतों से अपने आप ही हट जाएगा।


तो बोलो मीडिया नारायण की जय।


(सुशील मानव जनचौक के विशेष संवाददाता हैं।)  


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