विवेकानन्द का हिंदूवाद और राष्ट्रवाद


विवेकानंद हिमालय की कंदराओं में तपस्या करने वाले पलायनवादी साधु नहीं थे। उन्हें भारत के तैंतीस करोड़ लोगों से, जिन्हें वह देवता की संज्ञा देते थे, बेसाख्ता मोहब्बत थी। समाज की कुरीतियों पर, जिनमें जातिवाद प्रमुख था, वे कहर बन कर टूट पड़े थे। अत्याचारियों का वध करने तक की बात उन्होंने कही थी। उन्होंने पिछड़ी जातियों अर्थात् शूद्र राज की ऐतिहासिक भविष्यवाणी की थी। धर्म और विज्ञान के समन्वय की बातें भारत की धरती पर सबसे पहले विवेकानंद ने की थीं। उनकी सलाह के कारण प्रसिद्ध उद्योगपति जमशेदजी टाटा ने जमशेदपुर में तकनीकी शिक्षा का संस्थान खोला था और अपने संस्थान के पहले निदेशक के पद पर स्वामीजी से नियुक्त होने की प्रार्थना की थी। स्वामी विवेकानंद आध्यात्मिक के साथ साथ आर्थिक प्रगति भी चाहते थे। वे करोड़ों इंसानों को कीड़े मकोड़े नहीं समझते थे। उन्होंने मनुष्य के अन्दर आध्यात्मिक शक्ति के दर्शन किये थे। उन्हें ऐसी शक्तियों से लैस करके निर्णयात्मक लड़ाई लड़ने के पक्षधर थे।


विवेकानंद की शिक्षाओं में वीर बनना शामिल है। उन्होंने ललकारा था, ‘हे वीर, निर्भीक बनो, साहस धारण करो। गर्व करो कि हम भारतीय हैं। गर्व के साथ कहो कि मैं भारतीय हूं। हर भारतीय मेरा भाई है। बोलो ज्ञानहीन भारतीय, दरिद्र भारतीय, ब्राह्मण भारतीय, अछूत भारतीय मेरा भाई है। कहो प्रत्येक भारतीय मेरा भाई है। भारतीयता मेरा जीवन है। भारत के देवी देवता मेरे ईश्वर हैं। भारतीय समाज मेरे बाल्यकाल का पालना है। मेरे यौवन का आनन्द उद्यान है। पवित्र स्वर्ग है और मेरी वृद्धावस्था की वाराणसी है। हे शक्ति की मां मेरी निर्बलता को दूर करो। मेरी पौरुषहीनता को हटा लो और मुझे मनुष्य बना दो।‘‘


संविधान का मूल मकसद ‘धर्म निरपेक्षता‘ या ‘पंथ निरपेक्षता‘ या ‘सेक्युलरिज़्म‘ है। तीनों शब्दों के अलग अलग अर्थ हैं। यह समस्या एक पहेली या कच्छ के रण्ण की तरह विवाद का दलदल बन गई है। सबसे पहले विवेकानंद ने धार्मिक पंथसापेक्षता को सेक्युलरिज़्म का अर्थ बताया था। हिन्दुस्तान में कोई भी धर्म अनिवार्य उपस्थिति और आचरण का रहा है। इस देश को हिन्दू, मुसलमान, सिक्ख, ईसाई, पारसी, बौद्ध, जैन किसी की एकल जागीर नहीं समझा जा सकता। बंगाल में काली और दुर्गा की मूर्तियां मुसलमान कारीगर ही बेहतर बनाते हैं। राम और कृष्ण जैसे लोक चरित्रों को भारतीय संस्कृति की सिम्फनी बनाने का काम कबीर, रहीम, जायसी और रसखान जैसे चार बड़े मुसलमान कवियों ने दो बड़े हिन्दू कवियों सूरदास और तुलसीदास के साथ मिलकर किया है।


श्रीरामकृष्णदेव के अनुभवों को ध्यान में रखकर विवेकानंद ने कहा था ‘हम भारतीय केवल सहिष्णु ही नहीं हैं। हम सभी धर्मों से स्वयं को एकाकार कर देते हैं। हम पारसियों की अग्नि को पूजते हैं। यहूदियों के सिनेगाॅग में प्रार्थना करते हैं। मनुष्य की आत्मा की एकता के लिए तिल तिलकर अपना शरीर सुखाने वाले महात्मा बुद्ध को हम नमन करते हैं। हम भगवान महावीर के रास्ते के पथिक हैं। हम ईसा की सलीब के सम्मुुख झुकते हैं। हम हिन्दू देवी देवताओं के विश्वास में बहते हैं।‘ विवेकानंद ने भारत के दो बड़े धर्मों के अनुयायियों के मद्देनजर एक मार्के की बात अपने मित्र सरफराज हुसैन को लिखे पत्र में की थी। उन्होंने कहा था कि जिस दिन इस्लामी देह में वेदांती मन होगा, वह मानवीय गरिमा का उत्कर्ष होगा। स्वामी जी होते तो आज देश एक नई आध्यात्मिक सर्वदेशीय, सर्वभाषिक संस्कृति की बुनियादी पाठशाला बनना चाहता।   
 
विवेकानंद किस तरह हमारे लिए ज़रूरी या उपादेय हैं? महानता माइग्रेन की बीमारी नहीं है जो कभी कभी उभरे। वे प्रासंगिक नहीं शाश्वत हैं। उन्होंने भारतीय और पश्चिमी राजदर्शनों के इतिहास का निरंतर अध्ययन किया और दोनों समाजों के लिए नियामक मूल्य गढ़े। महात्मा गांधी को दलित, दरिद्र नारायण तथा हरिजन की सेवा करने का जो ऐतिहासिक श्रेय मिला उसके मूल में विवेकानंद के आग्रह थे। संभवतः विवेकानंद आज दलितों और आदिवासियों के आरक्षण को लेकर और अधिक आग्रही होते। विवेकानंद की थ्योरी के अनुसार दलित और आदिवासी अपने राजनीतिक अधिकार मांगेंगे नहीं, छीन कर लेंगे। उनका रास्ता हिंसक नहीं वैचारिक क्रांति का होगा। उन्हें सत्ता और हुकूमत उच्च वर्गो द्वारा दी नहीं जाएगी। उसे वे स्वयं अधिकार सहित ले लेंगे।


विवेकानंद के अनुसार सभ्यता का अक्स अंततः संस्कृति में होता है। नागर सभ्यता के उपभोक्ताओं को सुसंस्कृत होने का पीढ़ी दर पीढ़ी अवसर मिलता रहा है। यह अवसर इतिहास ने दलितों और पीड़ितों को नहीं दिया है। राजनीति में संस्कृति की आत्मा हो तो सर्वहारा के सर्वांगीण उत्थान की विवेकानंद की थ्योरी को कायिक रूप में सिद्ध किया जा सकता है। विवेकानंद ने दलितों का समर्थन हासिल करने के उद्देश्य से भाषण नहीं दिये थे। उनका मकसद हालात को बदलने से था और उपेक्षितों को उनका हक दिलाने से। स्वातंत्र्योत्तर भारत के अधिकांश चिंतकों के विचार स्थायी, अप्रतिहत और मार्गदर्शी नहीं हैं। विवेकानंद आज भी लाइट हाउस की तरह हैं। वहां अंधेरा आज भी पनाह मांगता है।
 Kanak Tiwari