आदम की संतानें, मनु की संतानें उस चोरी से आखिर कब बाज आएंगीं?






देना’ संसार की सबसे सुखकर क्रिया है। आपस में मिल-बाँट कर सभी मनुष्य सुखी रह सकते हैं। साझेदारी में सबकी सुरक्षा है। मनुष्य बनकर एक-दूसरे को प्रेम करने में ही सबका सम्मान है।



हज़ारों वर्ष पहले उपनिषद् के ऋषि ने कहा— ‘तेन त्यक्तेन भुञ्जिथाः।’ यानी भोगने से पहले त्याग करो। उस दान और त्याग का बोझ भी अपने चित्त पर मत रखो। आपसी प्रेम और भलाई के लिए देना सीखो। अपने आनंद के लिए देना सीखो।



बाबा बुल्लेशाह गाते थे—



दाणे उत्तों गुत्त विगुत्ती, घर घर पई लड़ाई।

असां कजीए तदांही जाले, जदां कनक ओन्हां टरकाई।



(आदम ने गेहूँ का एक दाना चुराया था, जिसकी सजा आज तक मानवता भुगत रही है।)



आदम की संतानें, मनु की संतानें उस चोरी से आखिर कब बाज आएंगीं? हम एक-दूसरे को केवल देना ही देना कब सीखेंगे? मिल-बाँटकर एक ही जैसा हो रहना कब सीखेंगे? विशेष से सामान्य होना कब सीखेंगे?



हम सभी सुखी और प्रसन्न ही रहना चाहते हैं न? तो कोई बताए भला, देने से बढ़कर, मिल-बाँटने से बढ़कर भी कोई आनंद है क्या?



हम शासक बने, हम शासित बने। उत्पादक बने, उपभोक्ता बने। मालिक बने, नौकर बने। जमींदार और किसान बने। ठेकेदार और मजदूर बने। औरत और मर्द बने। अमीर और गरीब बने। मनुष्य कब बनेंगे?



मिथिला में कहते हैं— ‘घी खसलहि कतय? राहैड़क दालिमे!’ (यानी घी थोड़ा गिर ही गया तो क्या हुआ, गिरा तो अरहर की दाल में ही न!)



फिर इतनी कृपणता क्यों? क्या हम मनुष्य भी घी और अरहर दाल की तरह एक-दूसरे की सुगंध और उपयोगिता बढ़ाने में योगदान नहीं दे सकते?



प्रकृति ने, कुदरत ने केवल देना ही सीखा है। लेकिन अपनी कृपणता के मारे हम मनुष्य एक-दूसरे को सता रहे हैं। अपने क्षुद्र लोभों के खातिर हम स्वयं को ही दुःखी कर रहे हैं।



सियासत अपने आप में एक समस्या है। वह हमें क्या समाधान देगी! व्यापार का प्रचलित स्वरूप अपने आप में एक समस्या है। व्यापारी और किसान दोनों ही उसमें दुःखी रहेंगे। कोई दो कौड़ी गँवाकर दुःखी होगा। कोई दो कौड़ी अतिरिक्त पाकर भी दुःखी ही रहेगा।



दुःख के इस कुचक्र से निकलने की कुंजी समाज के पास ही है। सियासत के पास नहीं है। हमारे समझने का फेर है। हमारे समझने की देर है।



~अव्यक्त, 27 नवम्बर, 2020