हाथरस एक अन्याय के खिलाफ प्रेरणा स्थल बन चुका है।

600 ठाकुर परिवार में से दो-चार पीड़ित परिवार के समर्थन में भी होंगे तो उन्हें भी खुलकर बोलने की हिम्मत नहीं पड़ रही होगी।



असल में हुआ कुछ यूँ कि शुरू शुरू में मामले का संज्ञान ही नहीं लिया गया।

बाद में जब लड़कीं के साथ बलात्कार के अलावा गर्दन जीभ रीढ़ तोड़ने ने तूल पकड़ा तो सुर्खियों में मामला आ गया। योगी सरकार ने दबाने ढकने के लिए जल्द क्रिया कर्म कर दिया।

हर मामले की तरह मुआवजे का चारा भी दिया, लेकिन कुछ पत्रकारों ने इस मामले की संवेदनशीलता को आगे बढ़कर पकड़ लिया और बात वायरल कर दी।



सब ढर्रा बिगड़ गया।



अब यह रेप न होकर नाक के बाल का सवाल बन चुका था। योगी प्रशासन और दल्ली मीडिया के एक हिस्से ने आश्वस्त कर रखा था, और कुछ ने तो लगता है यूपी सरकार की किरकिरी कराने के लिए भी कहा चिंता न करें।



लेकिन अब तो हाथरस एक अन्याय के खिलाफ प्रेरणा स्थल बन चुका है।

आधी आबादी बड़े ध्यान से बीजेपी और उसकी महिला सांसदों और दलित सांसदों की करतूत पर निगाह जमाये हुए हैं।



यूपी सरकार की अंतरराष्ट्रीय साजिश वाली खबर को चलाने के लिए उतना अच्छा बैक अप नहीं, जितना गुजरात मॉडल के पास है।

नतीजा वह एक दिन में ही ढेर हो चुका है।



लेकिन इस बीच प्रशासन और 1500 परिवार की गर्मी को पीड़ित परिवार के लिए झेल पाना वश के बाहर की चीज है।

हिन्दू समाज की सड़ाँध सबके सामने है।

एक दलित बेटी और परिवार को यदि न्याय मिलता है तो यदि उससे किसी उच्च जाति की हेठी होती है तो इसका मतलब ही है कि ये समाज, सरकार ऊंच नीच, विभेदी करण और देश तोड़ने वाली है।



आज पीड़ित परिवार गाँव छोड़ना चाहता है।



इंसाफ कौन दिलायेगा?



लड़कीं तो दो हफ्ते में ही इस नरक से मुक्त हो गई, लेकिन तिल तिल कर इस 73 साल से आजाद भारत में ये कैसी गुलामी? जिस परिवार से मिलने हर विपक्षी दल का नेता गया हो?



Ravindra Patwal