गणेश उस पत्रकारिता की लम्बी लकीर हैं जिसे अभी तक कोई पार नही कर सका ।






मेरे लिए जिस तरह राजनीति में पंडित नेहरू लिटमस पेपर हैं, ठीक वैसे ही पत्रकारिता में गणेश शंकर विद्यार्थी हैं, इनसे ही हम दाएं या बाएं का फर्क देखते हैं, मेरे लिए गणेश जी का जीवन वही माप है, जिसपर रोज़ खुदको रखकर तौलते हैं और हमेशा कम निकलते हैं । गणेश जी के ज़िक्र उस दिल मे होने चाहिए जो अपनी मौत तक हिन्दू मुसलमान में एकता चाहते हैं । एक बात उनसे और सीखिए,नए लोगों को बढ़ाना,समझाना और सहारा देकर खड़ा करना,यह भी तो हम भूल चुके हैं ।



गणेश शंकर विद्यार्थी का आज जन्मदिन है ।1890 अक्टूबर 26 को जन्मे गणेश उस पत्रकारिता की लम्बी लकीर हैं जिसे अभी तक कोई पार नही कर सका ।गणेश शंकर कभी यह कहकर रोए नही और न ही लोगों को उकसाया की हमे मार दिया जाएगा । न ही वह चीखे चिल्लाए और न ही डरे।बेख़ौफ़,साफदिल गणेश उस कट्टर मुसलमानों की भीड़ में कूद गए जो उनके नाम से ही उन्हें खत्म करने को आमादा थी ।वह उन कट्टर हिन्दुओं में भी उतरे जो मुसलमानो के घर और दुकान जलाकर उनके लोगों को मार देना चाहती थी ।



गणेश जब कट्टरपन से पगलाई भीड़ के सामने थे,तब भीड़ ठहर गई । लोगों ने कहा गणेश भैय्या हैं रुक जाओ,भीड़ रुक गई और गणेश जी के लफ्ज़ सुनना चाहती थी मगर एक बार नफ़रत में दहक चुके लोग,भला कब रुकते,भीड़ के पीछे से किसी ने उनपर कोई धारदार हथियार से हमला किया और भीड़ तीतर बितर हो गई,गणेश एकता और भाईचारा के पौधे को अपने खून से सींचने निकल गए ।



ख़ैर वह वक़्त निकल गया ।मारने वाले लोग नए आ गए तो मरने वाले भी नए आ गए ।गणेश शंकर को नमन की उन्होंने लिखने की ऐसी लकीर खींची जिसपर चलना सच्चे दिल की निशानी है । गणेश की मोहब्बत लम्बे अरसे तक हम जैसों को ताक़त देती रहेगी । हममें में से जो मर जाएँगे मगर शिकवा नही करेंगे ।जो मिट जाएँगे मगर अपनी माटी को शर्मिंदा नही होने देंगे । गणेश जी ने हमे सिखाया की हम सबके ख़ून से इंसानियत अगर खुशहाल हो तो मरना हमारा फ़र्ज़ हो जाता है... गणेश नमन आपको....














 






Hafeez Kidwai