शासन, महाजन और किसान

लगभग आठ साल पहले की बात है। दो जीव पंजाब सूबे के भारतीय हिस्सों में अपनी कुछ जिज्ञासाओं के साथ घूम रहे थे।


सबसे बड़ी जिज्ञासा थी कि पंजाब का किसान अपनी किसानी बारे में क्या सोचता है? खासकर सरकार और आढ़तियों के साथ अपने संबंधों को कैसे देखता है?


हम पंजाब के लगभग सभी हिस्सों में गए। गाँवों में गए। मंडियों में गए। ज़िलों और तहसीलों में गए। खेतों और बागानों में भी गए।


दरबार साहिब के अमृत सरोवर में केसरिया रंग की मछलियों को अठखेलियाँ करते हुए भी देखा। मत्था ठेका। परसाद खाया। सबद-कीरतन भी सुने। गुरु अर्जुनदेव जी की बानी चल रही थी- ‘मिठ बोलणा जी.. हर सजण स्वामी मोरा...’ गुरु का, कुदरत का उपदेश था कि हम मीठी वाणी बोलें।


तो मीठी वाणी में ही किसानों से दिल खोलकर बातें हुईं। आढ़तियों से भी बिना किसी पूर्वाग्रह के मिले। सबसे प्रेम और करुणा से मिले। ऐसे मिले जैसे कोई अपने ही परिजनों से मिलता है।


किसान यूनियन के समृद्ध नेताओं में एक प्रकार का अत्युत्साह होता है। वे भी सज्जन लोग ही होते हैं, लेकिन उनकी किसानी में व्यापार और राजनीति घुली-मिली होती है।


आढ़तिया एसोसिएशन के नेताओं से भी उनकी ‘व्यावहारिक समस्याओं’ के बारे में खुलकर बातें हुईं। 2 परसेंट मार्जिन का माया-मोह किस तरह बाकी 98 परसेंट पर भारी पड़ता है, यह समझ में आया।


अपेक्षाकृत छोटे किसानों की ऋणग्रस्तता की कहानियाँ बड़ी कारुणिक थीं। घर की महिलाओं और 40 पार कर चुकीं अविवाहित बेटियों से बात करके कई बार हमारी आँखें सजल हो जातीं। फोटो खींचते हुए कई बार हाथ काँपने लगते और आखिरकार नहीं ही खींच पाते।


किसान और आढ़तिये के बीच का संबंध इतना शुष्क नहीं है। वे लंबे समय से एक साथ गर्भनाल की तरह जुड़े रहे हैं। महाजनी निर्भरता से शुरू होकर ये अब ये एक प्रकार के संरक्षक (पेट्रन) और यजमान (क्लाइंट) के सहोपकारी संबंधों में बदल चुका है। लेकिन पेट्रनेज चाहे कैसी भी हो, होती वह लगभग गुलामी ही है।


लेकिन इतना होते हुए भी सामाजिक रूप से यह संबंध केवल सौदेबाजी वाला या ट्रांजैक्शनल नहीं है। प्रचलित नज़रिए से एक को पीड़ित और दूसरे को पीड़क के खाँचे में रखकर देखना आसान तो है, लेकिन यह दृष्टिकोण पूर्ण और पर्याप्त नहीं है।


राजनीतिशास्त्र की किताबों में पढ़ाते हैं कि राज्य या शासन एक ‘आवश्यक बुराई’ है। वह एक ‘नेससेरी ईविल’ है। ऐसे ही कभी-कभी आढ़तियों का चित्रण ‘डेविल’ के रूप में करते हैं। तो एक ‘ईविल’ हो गया और दूसरा ‘डेविल’ हो गया।


अब कॉरपोरेट के रूप में एक ‘सुपर-डेविल’ का भी भय व्याप्त है। वह गोडज़िला की तरह विचित्र शक्तियों से लैस बताया जाता है। वह पौराणिक कथाओं का ‘मय दानव’ बताया जाता है। यानी वह दिखता तो ‘रचनात्मक’ है, लेकिन वह छलिया भी (या छलिया ही) हो सकता है।


इधर शासन रूपी ‘ईविल’ किसी भी नाम, रूप या रंग का हो, वह ‘विकास’ नाम के चमकदार चेतक पर सवार होकर दायें-बायें देखे बिना ही दौड़ता रहता है। लेकिन उस रजोगुणी तुरंग के खुर में लगा कठोर नाल कब, किसे और कहाँ-कहाँ घायल कर सकता है, इसका उसे होश नहीं रहता।


किसान तो स्वभाव से ही राजा होता है। उसे राजा ही होना चाहिए। बल्कि उसी में असल शहंशाह होने की संभावना पाई जाती है। लेकिन आज वह भिखारी है। क्योंकि वह अपनी ताकत भूल गया है। वह भी इस पतनकारी और दिखावटी जीवन की अंधी दौड़ में पड़ गया है।


वह नशे में पड़ा। ऋण लेकर घी खाने के चक्कर में पड़ा। वह लाखों के दहेज के लेन-देन में पड़ा। खर्चीली और प्रदर्शनकारी शादियों की अंधी खाई में गिरा। वह कनैडा और कैनबरा के अपने भाई-बंधुओं से प्रतियोगिता के कुचक्र में फँसा। वह धरती का श्रमनिष्ठ सेवक होने की जगह जमींदार बनने की चाह में स्वधर्म से च्युत हुआ।


वह खिलौनों या सामग्रियों की तरह सजी कुड़ियों और हर बार एक नई मर्सीडीज़ से उतरकर उंगलियाँ लहराते मुंडों के वीडियोज़ के भुलावे में खो गया। गाँव-गाँव में महंगे रेस्तराँ और बार खुल चुके हैं। मौसमी तरकारी नहीं मिलेगी, लेकिन फ्राइज़, बर्गर, जिंगर और चिज़्ज़ा ज़रूर मिल जाएंगे।


बैंकों और केसीसी का मायाजाल फैला है। बीज से लेकर बोरी तक के लिए वह शासन और महाजन की दया पर निर्भर हो चुका है। अब वह तरह-तरह की बीमारियाँ लेकर बैठा है। इलाज के पैसे आढ़तिया देता है। ज़मीनें तक बंधक हो चुकी हैं।


वह अपना ही उगाया जहरीला गेहूँ और चावल नहीं खाना चाहता। सब्जियों पर जहरीली दवाइयाँ छिड़कते-छिड़कते वह खुद कैंसर के मुँह में जा गिरा है। मिट्टी उसकी कबकी मर चुकी है। मिट्टी के सूक्ष्म मनुष्योपकारी जीवों की चीख उसे समय रहते सुनाई नहीं पड़ी।


इसलिए आज वह शासन और महाजन के बीच थाली के बैंगन की तरह इधर-उधर लुढ़क रहा है। वह अपनी ही शक्ति भूल चुका है। यह बात केवल पंजाब ही नहीं, कमोबेश देश के लगभग सभी हिस्सों के किसानों पर लागू होती है।


गुरु नानक देव जी स्वयं किसानी करते थे। स्वयं हल चलाते और फसल काटते हुए उनकी सौम्य छवियाँ आज के किसानों को आईना दिखा सकती हैं। उन्हें उनके स्वधर्म की याद दिला सकती हैं। पंथवादी कट्टरता की जगह उन्हें सच्ची रूहानियत की ओर ले जा सकती है।


‘जपुजी साहिब’ में गुरु नानक देव जी ने अपने अंतिम श्लोक (सलोकु) में कहा है—


“पवणु गुरु, पाणी पिता, माता धरती महतु।
दिवसु राति दुइ दाइआ खैले सगल जगतु।
चंगिआईआ बुरिआईआ वाचै थरमु हदूरि।
करमी आपो आपणी के नेड़ै के दूरि।”


यानी धरती माता है, पानी पिता है और हवा गुरु है। इनपर किसी की मालिकी नहीं हो सकती। रात और दिन काल के प्रतिनिधि हैं जो पूरे संसार को बच्चे की तरह खेल खेला रहे हैं। अच्छे और बुरे सभी कामों का हिसाब-किताब उसके दरबार में रखा जाता है। कोई उससे नजदीक रहे या दूर, उसे अपने कर्मों का फल भोगना ही पड़ता है।


शासन और महाजन तो भटके हैं ही। धरती, पानी और हवा का वे सौदा कर चुके हैं। अहंकार और पतन के पंथ पर वे अपना मूल ही गँवा चुके हैं। दिखाई भले न देता हो, लेकिन भुगत तो रहे ही हैं। लेकिन किसान आज भी चाह ले तो अपनी रूहानियत से इन भूलों को राह दिखा सकता है।


फिर वो हाथ फैलाकर नहीं, बल्कि सिर उठाकर कविगुरु रवि ठाकुर की तरह मुक्तकंठ से उद्घोष करेगा—


আমরা সবাই রাজা (आमरा सबाइ राजा)
आमादेर एइ राजार राजत्वे—
नइले मोदेर राजार सने मिलब की स्वत्वे!


सबका मंगल हो, सबका भला हो! 🙏


~अव्यक्त, 21 सितंबर, 2020