कोरोना संकट के आतंक के बीच  कोल ब्लाको को निजी कंपनियों को बेचने की तैयारी

आम जन को सुरक्षा का वास्ता और घरों में बैठने की सलाह देकर मोदी सरकार प्राकृतिक संसाधनों को अंतरराष्ट्रीय-राष्ट्रीय बाजार में बेचने की तैयारी में जुट गयी है. कोरोना संकट के बीच राहत पैकेज के नाम पर पचास कोल ब्लाकों को बेचने की योजना है जिसमें 22 कोल भंडार झारखंड के हैं. 


अब तक कोल भंडारों से कोयले की निकासी और उसे बेचने का एकाधिकार सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी सीसीएल का था. अब इस एकाधिकार को खत्म कर इसमें सौ फीसदी एफडीआई की गुंजाईश कर दी गयी है. इससे कोरोना संकट को निपटने में ततकाल क्या मदद मिलेगी, यह तो समझ में नहीं आता. हां, सरकार के इस निर्णय के खिलाफ विरोध को कुचलने में आसानी होगी.


फिर भी, आईये हम कोल ब्लाॅक के आवंटन का मतलब समझे.


सबों को याद होगा कि कांग्रेस के शासन काल में कोल ब्लाॅकों की नीलामी की प्रक्रिया शुरु हुई थी. उस वक्त नीलामी में एक काल्पनिक राशि - करीबन एक लाख 76 हजार करोड़-  के घाटे की बात कह कर सुप्रीम कोर्ट ने उस नीलामी को रद्द कर दिया था. इस प्रकरण की आंच झामुमो सुप्रीमो शिबू सोरेन तक भी पहुंची थी जो उस वक्त केंद्रीय मंत्री थे. उन्हें मंत्रिमंडल से इस्तीफा देना पड़ा था. 


2014 में सत्ता में आने के बाद से मोदी सरकार कोल ब्लाकों की नीलामी में लग गयी है. उनका दावा था कि वे नीलामी से ज्यादा धन राशि ला कर दिखायेंगे. लेकिन उसमें वे सफल नहीं हुए. लाख कोशिशों के बावजूद कोई कंपनी कोल ब्लाॅक खरीदने नहीं पहुंची. खरीदारों को इस बात का डर था कि जमीन के अधिग्रहण का जमीन पर जनता विरोध करेगी. साथ ही श्रमिक संगठनों के विरोध की वजह से सरकार कामर्शियल माईनिंग की इजाजत नहीं दे पा रही थी.


अब कोरोना संकट के इस आतंक भरे दौर में सरकार ने इस प्रावधान को खत्म कर दिया है कि कोल ब्लाॅक उन्हीं कंपनियों को बेचा जायेगा जो सीमेंट, स्टील और विद्युत उत्पादन करने वाली कंपनियां हैं और उन्हें अपने कारखानों के लिए कोयले की जरूरत है. अब कोई भी निजी कंपनी कोल ब्लाॅकों को नीलामी में प्राप्त कर सकेगी और कोयला निकासी कर किसी भी कंपनी को बेच सकेगी.


इसका परिणाम ?


पहले कोयला निकलता था और बिकता था तो मुनाफा राष्ट्र का होता था. अब निकासी के बाद जो कोयला बेचा जायेगा और जो मुनाफा होगा, उसका एक बड़ा हिस्सा निजी कंपनियों के पाकेट में जायेगा.


सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी सीसीएल में कोयला क्षेत्र के राष्ट्रीयकरण के वक्त करीबन 7 लाख श्रमिकों को नियमित रोजगार मिला था जो घट कर अब पौने चार लाख रह गया है. काम तो अभी भी सात लाख श्रमिक ही कर रहे हैं, लेकिन करीबन तीन साढ़े तीन लाख श्रमिक ठेका श्रमिक हैं. 


लेकिन निजी कंपनियां स्थायी नौकरी देने से रही. कुछ टेकनोक्रेटों और बाबूओं को छोड़ ठेका श्रमिक के रूप में ही रोजगार मिलेगा. कारपोरेट के लाभ के लिए श्रम कानूनों को खत्म किया जा रहा है. मोदी सरकार की समझ है कि प्रवासी श्रमिक लाचारी में कम से कम मजूरी पर काम करने के लिए मजबूर होंगे.


कोयला उर्जा का एक प्रमुख स्रोत है. लेकिन वह भंडार सिमित है. उसे मितव्ययिता से खर्च करने की जरूरत है. लेकिन निजी कंपनियां अपने लाभ के लिए सस्ते श्रम की मदद से उसका अंधाधुंध दोहन करेंगी, जबरदस्त मुनाफा कमायेगी.
और करेंगी रहे सहे वन क्षेत्रों का विनाश.
छोड़ जायेंगी विरूपित धरती, प्रदूषित नदियां. 
पर्यावरण का विनाश होगा.


याद दिलाने की जरूरत नहीं कि कोरोना संकट से सर्वाधिक प्रभावित वे राज्य और महानगर हैं जहां प्रदूषण भी सर्वाधिक है. जनजातीय क्षेत्र - पांचवीं-छठी अनुसूची के क्षेत्रों में यदि कोरोना संकट का तांडव विकराल नहीं हुआ है तो उसकी वजह वहां की थोड़ी बहुत बची हरियाली और शुद्ध हवा भी है.
इसलिए जरूरी है कि हम कोल खदानों के निजीकरण का विरोध करें. और विरोध होगा भी. 


यह तस्वीर झरिया के ओपन कास्ट माईनिंग की है, जो कुछ वर्ष पूर्व मैंने ली थी. माईनिंग के बाद धरती इसी तरह विरूपित हो जाती है. और श्रम के शोषण की इंतहा..


विनोद कुमार