सम्राट अशोक के पुत्र महिंद थेर पाटलिपुत्र में कहाँ रहते थे?

जैसा कि मैंने फाहियान के हवाले से बताया है कि सम्राट अशोक के एक छोटे भाई अर्हत होकर राजगीर के गृद्धकूट पर्वत पर रहते थे।


सम्राट अशोक अपने छोटे भाई को पाटलिपुत्र लाना चाहते थे। मगर गृद्धकूट की शांति को छोड़ कर उनके छोटे भाई पाटलिपुत्र आना नहीं चाहते थे।


सम्राट अशोक ने छोटे भाई के लिए पाटलिपुत्र में गृद्धकूट की भाँति कृत्रिम पर्वत और उसमें गुफा बनवा डाले और छोटे भाई से आग्रह किए कि पाटलिपुत्र चलो।


मगर संतन को कहाँ सीकरी ( फतेहपुर सीकरी ) सों काम अर्थात संत को राजधानी से क्या लेना-देना।


ह्वेनसांग के विवरण से ज्ञात होता है कि छोटे भाई पाटलिपुत्र नहीं आए। तब सम्राट अशोक के पुत्र महिंद थेर उसी कृत्रिम पर्वत पर बने गुफानुमा आवास में रहने लगे।


पाटलिपुत्र का वहीं कृत्रिम पर्वत पर बने गुफानुमा आवास आजकल के पटना में स्थित भिखना पहाड़ी नामक मुहल्ला है।


भिखना पहाड़ी का मतलब हुआ - " भिक्खु की पहाड़ी "। भिखुनी का पुलिंग रूप भिखना है।


लाॅरेंस वाडेल 19 वीं सदी के आखिरी दशक में भिखना पहाड़ी को देखने गए, जाँच किए और अपनी पुस्तक " डिस्कवरी आॅफ दि इग्जैक्ट साइट आॅफ अशोकाज क्लासिक कैपिटल आॅफ पाटलिपुत्र " ( 1892 ) में लिखे कि सचमुच यह एक कृत्रिम पहाड़ी है। कोई 40 फीट ऊँची है और कोई 1 मील के घेरे में है।


फिलहाल यहाँ पटना के नवाब साहब का निवास है। बड़े  - बड़े पत्थर बिखरे पड़े हैं। ईंटों का मलबा है। पहाड़ी के उत्तरी - पूरबी कोने पर मठ है। मठ में जिसे पूजा जाता है, उसे लोग " भिखना कुँवर " कहते हैं। भिखना कुँवर अर्थात वहीं राजकुमार महिंद।


लाॅरेंस वाडेल ने भिखना कुँवर की पूजा करने वाली कुछेक जातियों का भी जिक्र किए हैं, जिनमें दुसाध, ग्वाल, अहीर आदि प्रमुख हैं। ये लोग दूध, मिठाई, फल, फूल, रेशमी धागों आदि से भिखना कुँवर को पूजते थे।


अशोक के राजमहल से यह उत्तर की ओर है। बगल में कोई 2 किलोमीटर की दूरी पर गंगा के किनारे महेंद्रू घाट है। आसपास महेंद्रू मुहल्ला फैला हुआ है। महेंद्रू मुहल्ला कुँवर महिंद थेर की स्मृति कराता है।


लाॅरेंस वाडेल ब्रिटिश इंडियन आर्मी में मेडिकल आॅफिसर थे। बाद में प्रोफेसर हुए। अन्वेषक थे। पटना के अगम कुआँ का अन्वेषण और उसे सम्राट अशोक से पहली बार जोड़ने का श्रेय लाॅरेंस वाडेल को है।


लाॅरेंस वाडेल ने कुँवर महिंद थेर के पाटलिपुत्र स्थित आवास की यह तस्वीर अपनी उस पुस्तक में दी है।


राजेंद्र प्रसाद सिंह