हिंदी साहित्य का इतिहास - लेखन नहीं के बराबर हो रहा है। पहले जो इतिहास- लेखन में सक्रिय रहे, उन्होंने जान - बूझ कर हाशिए के लेखन को उपेक्षित किए।

सिद्ध कवियों की संख्या 84 थी। नाथों की 9 थी। सिद्ध और नाथ कवियों में सर्वाधिक शूद्र थे। मछुआरे, चर्मकार, धोबी, डोम, कहार, दर्जी, लकड़हारे और बहुत से शूद्र कहे जाने वाले कवि थे।


रामचंद्र शुक्ल ने इनकी कविताओं को सांप्रदायिक माना और लिखा कि सिद्धों और नाथों की कविताएँ शुद्ध साहित्य नहीं है। अर्थात हिंदी साहित्य के इतिहास में इन्हें जगह नहीं मिलनी चाहिए। जबकि हिंदी साहित्य की आरंभिक इमारत इन्हीं शूद्रों की कविताओं पर खड़ी है।


सिद्ध और नाथ कवि मूल रूप से उत्तरवर्ती बुद्धिस्ट थे। शायद इसीलिए शुक्ल जी को लगा कि इनका साहित्य सांप्रदायिक है। जबकि सूरदास और तुलसीदास भी किसी न किसी संप्रदाय से जुड़े थे। मगर शुक्ल जी की नजर में वे हिंदी के महाकवि हो गए।


रामचंद्र शुक्ल ने भक्तिकाल के इतिहास  - लेखन में जिन पुस्तकों का इस्तेमाल किया है, वे भी सांप्रदायिक थे। मिसाल के तौर पर चौरासी वैष्णवन की वार्ता, दो सौ बावन वैष्णवन की वार्ता आदि ग्रंथ भी वल्लभ संप्रदाय के सांप्रदायिक ग्रंथ हैं।


इतिहास  - लेखन में सांप्रदायिक ग्रंथों का इस्तेमाल होने के कारण रामचंद्र शुक्ल रसखान को हिंदी का पहला समलैंगिक कवि बता गए और लिखा कि रसखान पहले एक बनिए के लड़के पर आसक्त थे, सदा उसी के पीछे - पीछे फिरा करते और उसका जूठा खाया करते थे।


अष्टछाप के कवियों में कुल 8 कवि थे। उन 8 में एक कुनबी जाति के कृष्णदास भी शामिल थे। कृष्णदास पर आगजनी और डकैती करने का आरोप है, जबकि अन्य 7 कवि पाक साफ़ है।


रसखान और कृष्णदास की छवि सांप्रदायिक ग्रंथों ने बिगाड़ी है। अन्य ग्रंथों में ऐसा विवरण नहीं मिलता। निष्पक्ष आलोचक को अन्य स्रोतों से इसकी जाँच करनी चाहिए। मगर अपने संप्रदाय की भक्ति का शिकार आलोचक ऐसा नहीं कर पाता है।


संत साहित्य के बारे में शुक्ल जी ने लिखा है कि इस शाखा की रचनाएँ साहित्यिक नहीं हैं - फुटकल हों या पदों के रूप में हों, इनकी भाषा - शैली अधिकतर अव्यवस्थित और ऊटपटाँग है।


सोच लीजिए कि जिस संत साहित्य में कबीर और रैदास से लेकर घासीदास तक बड़े - बड़े कवि हुए, उसी संत साहित्य को शुक्ल जी ने लिखा है कि इनकी रचनाएँ साहित्यिक नहीं हैं और भाषा ऊटपटाँग है।


जैसा कि हम कह आए हैं कि अष्टछाप के 8 कवियों में कुनबी जाति के एक कवि कृष्णदास को शामिल किया गया है तो यह एक तकनीक थी, जिसका इस्तेमाल आधुनिक काल में भी किया गया और छायावाद की त्रयी में दो ब्राह्मण कवियों के बीच एक बनिए को बतौर तकनीक शामिल कर लिया गया या फिर नई कहानी की त्रयी में एक पिछड़ा राजेंद्र यादव को शामिल कर लिया गया।


आधुनिक काल की जिन हिंदी पत्रिकाओं को सिर माथे चढ़ाकर हिंदी साहित्य का इतिहास लिखा गया, उनमें सरस्वती और मर्यादा से लेकर कल्पना तक शुमार है। ओमप्रकाश दीपक ने लिखा है कि " कल्पना " के शतांक पर मैंने उन साढ़े पाँच सौ से अधिक भारतीय लेखकों की सूची देखी, जिनकी पुस्तक की समीक्षाएँ " कल्पना " के सौ अंकों में छपी है। इनमें डेढ़ सौ से अधिक नाम ऐसे हैं, जिनके आगे लगी हुई शर्मा, पाठक, पांडे, अवस्थी, चतुर्वेदी आदि उपाधियाँ उनके ब्राह्मण होने की घोषणा करती हैं।


" मर्यादा" भी अपवाद नहीं थी। मर्यादा के नवंबर,1912 अंक में कुल मिलाकर 15 रचनाएँ छपी हैं, जिनमें मिश्र, अवस्थी, जोशी, गोस्वामी, चौबे, शुक्ल, त्रिवेदी और मालवीय आदि उपाधिधारक रचनाकारों की संख्या 13 है। खैर, " सरस्वती " की बात निराली थी। इस पत्रिका ने तो जयशंकर प्रसाद को भी छापने से परहेज किया।


फिलहाल अनेक कवि और लेखक साहित्य की दुनिया में सक्रिय हैं। कविता, कहानी, उपन्यास और साहित्य की अनेक विधाएँ धुआँधार लिखी जा रही हैं। मगर हिंदी साहित्य का इतिहास - लेखन नहीं के बराबर हो रहा है। पहले जो इतिहास- लेखन में सक्रिय रहे, उन्होंने जान - बूझ कर हाशिए के लेखन को उपेक्षित किए। यदि आज भी हाशिए का समाज सजग नहीं हुआ तो ये तमाम लेखक - कवि मिट जाएंगे।


जरूरत इस बात की है कि हिंदी साहित्य का मुकम्मल इतिहास - लेखन हो ताकि अच्छे - अच्छे साहित्यकारों को बगैर जाति, संप्रदाय और प्रांत पर विचार किए इतिहास में समेटा जा सके। छायावाद के प्रमुख चारों कवि सिर्फ उत्तर प्रदेश के हुए, जबकि आज की तारीख में हिंदी 10 प्रांतों की भाषा है। प्रयोगवाद भी उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के दायरे से बाहर नहीं निकल सका। 


कोई हिमाचल प्रदेश और हरियाणा का इतिहासकार हो तब तो कोई बात बने। शुक्ल जी, द्विवेदी जी, चतुर्वेदी जी सब तो वहीं उत्तर प्रदेश के थे, जिन्होंने हिंदी साहित्य का इतिहास लिखे हैं।


बहुत दिनों तक हिंदी साहित्य का केंद्र कोलकाता रहा, फिर काशी आया, तब इलाहाबाद गया, अभी दिल्ली में है। यहीं कारण कि रिमोट एरिया के कवि - लेखक उपेक्षित से हैं। इसे तोड़ना होगा।


तेज प्रताप नारायण और उनकी टीम ये काम कर रही है। हर तबके, हर संप्रदाय, हर प्रांत के कवि - लेखकों को वे जोड़ रहे हैं। " शब्दों की अदालत में " कुल मिलाकर 73 कवि हैं। माँझी, पटेल, यादव, गंगवार, वर्मा, महतो से लेकर शर्मा- द्विवेदी तक अनेक नाम हैं। पूरी डेमोक्रेसी है।


" परदे के पीछे की बेखौफ आवाजें" में उन्होंने 30 महिला कवि को पिरोने का काम किया है। पूरी आधी आबादी है। हर तबके, हर प्रांत की महिला कवि हैं। महिला - लेखन के अंदर भी पूरी डेमोक्रेसी है।


तेज प्रताप नारायण की टीम ने डेमोक्रेटिक तरीके से एक उपन्यास भी लिख डाला है। कुल 8 उपन्यासकारों ने मिलकर एक संयुक्त उपन्यास लिखा है - जिंदगी है ....हैंडल हो जाएगी। यह हिंदी साहित्य में सर्वथा नूतन प्रयोग है।


तेज प्रताप नारायण मूल रूप से कवि, कहानीकार और उपन्यासकार हैं। रेलवे विभाग में हैं। बरसों से साहित्य में सक्रिय हैं। इनका 4 काव्य - संग्रह, दो कहानी - संग्रह और एक उपन्यास प्रकाशित है।


अज्ञेय ने " तार सप्तक " का संपादन कर हिंदी साहित्य में प्रयोगवाद की नींव रखी थी। तेज प्रताप नारायण और उनकी टीम ने " मशाल " ( वार्षिकी ) का संपादन कर हिंदी साहित्य को डेमोक्रेटिक और वैज्ञानिक राह पर लाने का विराट प्रयास किया है। वैज्ञानिक इसलिए कि इस टीम के लेखन में कहीं भी चकवा - चकई और पौराणिक मिथकों का बिंब - प्रतीक नहीं है। सब कुछ वैज्ञानिक और तार्किक है।


हिंदी साहित्य का आधुनिक परिदृश्य चौड़ा हो रहा है। विज्ञान और तकनीकी क्षेत्र से भी शब्द हिंदी कोश में निरंतर आ रहे हैं। हिंदी की जड़ता टूट रही है। पारंपरिक आलोचना- पद्धति, रस - सिद्धांत, साहित्य का सौंदर्यबोध - सभी को इस टीम ने प्रश्नबिद्ध किया है।


हर प्रांत से, हर तबके से, हर संप्रदाय से कवि - लेखकों की यह टीम बनी है। रजनीश संतोष, दामिनी यादव, डाॅ. स्नेह सुधा, संतोष पटेल, अभिषेक भोजपुरिया, विक्रम प्रताप सिंह सचान, प्रो. शत्रुघ्न कुमार, डाॅ. गोरख प्रसाद मस्ताना, राजेश कुमार माँझी, अनुपमा सरकार, पूनम यादव, नीलम सक्सेना चंद्रा, प्रो. चंद्रदेव यादव, डाॅ. कर्मानंद आर्य, बिपिन बिहारी टाइगर, अनंत सिन्हा, रचना चौधरी, कंचन बिष्ट खेतवाल, सीमा पटेल, दमयंती गंगवार, वर्षा चतुर्वेदी, पूनम जाकिर, फरहा नजीर, वीनस सिंह, पल्लवी श्रीवास्तव, रमण भारतीय, अरविंद शेष, डाॅ. शिव कुशवाहा आदि अनेक कवि - लेखक हिंदी साहित्य की इस विकास - यात्रा में सहयोग कर रहे हैं।


हम उम्मीद करते हैं कि अब हिंदी साहित्य भी डेमोक्रेटिक होकर रहेगा।


पूरी टीम को बधाई और शुभकामनाएँ।


राजेंद्र प्रसाद सिंह