जागने का अर्थ जिंदा होना भी होता है


विकसित देश क्या करते हैं? अपने देश में पेड़ नहीं काट सकते, बड़े कारखाने नहीं खोल सकते। नियम बहुत सख़्त हैं और खुद सख़्ती से उन नियमों का पालन भी करते हैं। उन्हें खुला जंगल, साफ़ झील, साफ़ नदी, साफ़ और खुली हवा चाहिए, शोर और बेवजह की भीड़ नहीं चाहिए। इसलिए इन चीजों का निजीकरण नहीं करते। शारीरिक श्रम करने वाले लोग बहुत महंगे होते हैं। इसलिए सब अपना काम खुद ही करते हैं। हर छोटी-छोटी बात में आदमी की सुरक्षा के पचास नियम हैं। पानी, बिजली, शिक्षा, रोजगार, अच्छी सड़कें, सबकुछ सबके लिए है। भ्रष्टाचार गली, मुहल्ले और सड़कों से शुरू नहीं होता। अनुशासन और नागरिक कर्तव्यों का पालन करना, आम जनता का भी काम है। लोगों के लिए, लिए गए निर्णय को, लोगों के बीच लाने से पहले, अधिकारी जनता के साथ बैठक करते हैं, प्रबुद्ध लोगों की सहमति लेते हैं। उनके बीच बहस और बातचीत लाते हैं।


पर विकसित देशों को कारखाने, बाज़ार और संसाधन तो चाहिए ही। वह कहां से मिलता है? विकासशील देशों से। जंगल, पहाड़ उधर कटे, प्रदूषण उधर बढ़े, कारखाने उधर खुले, सस्ते मजदूर उधर से मिले, सामान भी उधर ही बने, अपने देश का टैग लगाकर उन्ही देशों के बाज़ार में, उन्ही लोगों के बीच बेच देते हैं। सारे संसाधन उधर से ही चाहिए। उधर की जनता भगवान भरोसे जिएं। धर्म के नाम पर लड़े या दीवार बनाएं। क्या फ़र्क पड़ता है?


दूसरी ओर वे जंगल, ज़मीन, पर्यावरण, भाषा, संस्कृति, आदमी के संरक्षण के नाम पर विकासशील देशों में अपना एनजीओ भी साथ-साथ चलाते हैं। इन विषयों पर वैश्विक स्तर पर बहस भी करते हैं, गरीब देशों में अपना धर्म भी पहुंचाते हैं। धर्म के साथ लोगों को पढ़ाते-लिखाते हैं, इस व्यवस्था का प्रतिरोध करने के लिए नहीं, इसलिए कि वे लोग बाज़ार से उनका सामान खरीद पाने के योग्य हो सके। आतंकवाद और धर्म दोनों को एक साथ सहयोग भी करते हैं। हत्या और दान साथ-साथ चलता है। बचाने के नाम पर वे दूसरे देशों में सेना भी बैठा देते हैं, जब चाहें बम भी गिराते हैं। इस तरह मारने और बचाने का खेल एक साथ चलता रहता है। ताकतवर देश का मतलब होता है जो एक साथ मारने और बचाने की ताक़त रखता हो, यह कला जानता हो। 
अब ऐसे देश की सरकार किसी विकासशील देश में चली आए और वहां की सरकार की तारीफ़ भी करती रहे तो क्या होता है? अपनी नीतियों के प्रति वह पहले से ही बहुत स्पष्ट होती है।


विकासशील देश की धर्म में धंसी, भूखी, गरीब जनता उनके आने को ऐसे देखती है, जैसे कोई देवता आ गया हो। मगर दोनों जगहों की सरकारों की मूल संस्कृति एक ही है। एक, विकासशील देशों को लूटती है और दूसरी, उसी संस्कृति की वाहक सरकार, अपने देश में जनता को लूटती है। उनका आधा काम खुद सरकार करती है। अब जब दोनों मिलते हैं तो आधी जनता का जी करता है कि उनके चरण धो-धो कर पिएं। देश के थोड़े से तथाकथित सुरक्षित लोग अपने देश और सरकार की तारीफ़ टीवी पर सुन-सुनकर, खुद को धन्य मानते हैं। नहीं सोचते कि यह ख़ुशी, उनके भीतर गहरी दबी असुरक्षा और विवशता से आती है। असुरक्षित, कमजोर, गुलाम आदमी के लिए, किसी ताकतवर आदमी के मुंह से अपनी तारीफ़ सुन लेने से बड़ी ताक़त और क्या होगी इस जन्म में? 


गुलाम होने और गुलाम बनाने के तरीके भर बदले हैं। जब तक जनता अपनी सरकार से अपने देश में व्यवस्था दुरुस्त करने, लोगों को रोजगार देने, जीवन की मूलभूत जरूरत सबके लिए मुहैया कराने, जंगल-पहाड़ बचाने और आम जनता को सशक्त करने के सवाल नहीं पूछती, जब तक सारे भेद भूलकर, देश में धर्म, जाति के नाम पर हमेशा अशांति, हिंसा, दंगा वाली स्थितियों को रोकने पर सवाल नहीं उठाती, इस देश को गर्त में जाने से कोई नहीं बचा सकता।
नेटिव अमेरिकन आदिवासी डकोटा के विलिफ़ सिस्टम के अनुसार "नेशन" का अर्थ "जीने का तरीका" होता है। जिस तरीके से आज देश जी रहा है, इसके लिए सिर्फ सरकार जिम्मेदार नहीं है, देश को गर्त में ले जाने का यह लोगों का भी "कलेक्टिव वर्क" बनता जा रहा है। 


कभी ना कभी भ्रम की गहरी नींद से आदमी को जागना पड़ता है, नहीं तो वह मृत घोषित कर दिया जाता है। सांस लेते रहने भर का नाम ही जिंदा होना नहीं है। जागने का अर्थ भी जिंदा होना होता है...।


© जसिंता केरकेट्टा 
 (अमेरिका से लौटते हुए)