मेरा सफरनामा नेताजी सुभाष चंद्र बोस के सहयोगी कैप्टन अब्बास अली

VETERAN FREEDOM FIGHTER & SOCIALIST LEADER CAPT. ABBAS ALI ON NETAJI SUBHASH CHANDRA BOSE IN HIS AUTOBIOGRAPHY “MERA SAFARNAMA”


नेताजी सुभाषचंद्र बोस जर्मनी से पनडुब्बी के ज़रिये जापान होते हुए सिंगापुर पहुंचे। उनके आने के बाद सिर्फ़ जंगी कै़दी ही आई.एन.ए. में शामिल नहीं हुए बल्कि साउथ ईस्ट एशिया के लाखों शहरी, औरतें और मर्द आज़ाद हिंद फ़ौज में शामिल हुए । 1942 में नेता जी के आने के बाद इस इलाके़ में सभी हिन्दुस्तानियों में एक नया जोश पैदा हुआ। आज़ाद हिंद फ़ौज के सुप्रीम कमांडर की हैसियत से उन्होंने आई.एन.ए. की नये सिरे से शुरूआत की। नये ब्रिगेड और दस्ते बनाये गये। और देशप्रेम का जोश पैदा किया। यहां तक कि औरतों ने जेवर उतार कर नेताजी के पैरों पर डाल दिए। कर्नल लक्ष्मी को रानी ऑफ झांसी बटालियन का कमांडिंग अफ़सर बनाया गया। हमें मैदानी और जंगलों में लड़ाई लड़ने का प्रशिक्षण दिया गया। इंडियन नेशनल आर्मी को नेताजी ने एक बेहतरीन लड़ाकू फ़ौज के रूप में प्रशिक्षित किया था जो किसी भी फ़ौज का मुक़ाबले करने की ताक़त रखती थी।


सियासी तौर से नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने जापानी हुक़ूमत से एक समझौता किया था और यह तय पाया था कि हमारी हिंदुस्तानी फ़ौज जापानी फ़ौज से कंधे से कंधा मिला कर अंग्रेजी साम्राज्यशाही के ख़िलाफ़ लड़ेगी। हमारे पास मैनपावर तो है मगर लड़ाई लड़ने के लिए हमें गोला-बारूद, हथियार और तोपख़ाने के साथ-साथ और भी दूसरी चीज़ों मसलन राशन और पेट्रोल वगैरह की ज़रूरत होगी और इस लड़ाई में सब से अहम् हवाई ताक़त है अगर हवाई जहाज़ से 'रिपल्स' और 'प्रिंस ऑफ वेल्स' की चिमनियों में जापानी फ़ौजी न उतरते तो सिंगापुर और मलाया को फ़तेह करना मुश्किल होता इसलिए हमारी आज की सब से बड़ी ज़रूरत हवाई ताक़त है। जापानियों ने इन सब ज़रूरतों को जायज़ माना और इनको आई.एन.ए. को वक़्त पर मुहैया कराने का वायदा किया।


नेता जी ने पूरे साउथ ईस्ट एशिया का दौरा किया। वो हर शहर और छावनी में जाते जहां कहीं हिंदुस्तानी फ़ौजी क़ैदियों के कैंप थे। वहां अफ़सरों, जवानों और हिंदुस्तानी शहरियों के दरम्यान जोशीली तक़रीरों करते थे। जिसे सुनकर हिंदुस्तानी तो क्या जापानी अफ़सर भी दंग रह जाते थे। उनकी तक़रीरें सुनकर आदमी के रोंगटे खड़े हो जाते थे। और अक्सर उनकी तक़रीर के दौरान हज़ारों लोग उनकी फ़ौज में भर्ती के लिए अपने आप को पेश करते थे। यहां तक कि बर्मा, मलाया, जावा, सुमाटरा, हिंद चीन, बोरीन्यू फ़ारमूसा हत्ताकि चीन और जापान में भी जहां कहीं हिंदुस्तानी रहते थे वो इस आज़ादी की लड़ाई में जिस तरह का सहयोग दे सकता था वो उससे सहयोग मांगते थे। उनका नारा था - "Give me blood, I shall give you liberty"
एक साल की पूरी दौड़-धूप के बाद उन्होंने काफ़ी दौलत, लाखों आदमी और उनमें लड़ाई लड़ने का जज़्बा कूट-कूट कर भर दिया था। 21 अक्तूबर 1943 को उन्होंने आज़ाद हिंद गवर्नमेंट क़ायम की और रंगून की एक फ़ौजी परेड में जापान के वज़ीरे आजम फील्ड मार्शल टोजो ने उन्हें अंडमान निकोबार जज़ीरे हुक़ूमत करने के लिए सौंपे। आज़ाद हिंद गवर्नमेंट को जर्मनी, जापान और इटली के अलावा दुनिया के ग्यारह और मुल्क़ों ने तसलीम किया था। यह एक ऐसा इंक़लाब था जिसे नेता जी हिंदुस्तान की सरज़मीं से बाहर पड़ोसी मुल्क़ों में रहने वाले हिंदुस्तानी और जंगी क़ैदियों की मदद से लाये थे। आज़ाद हिंद गवर्नमेंट ने जनरल मोहन सिंह की बनाई हुई इंडियन नेशनल आर्मी को अपनी आर्मी के तौर पर अपना लिया। मलाया, बर्मा, जावा, सुमाटरा और हिंद चीन में इसके कैंप क़ायम किए गए जहां बड़े पैमाने पर फ़ौजी टेªनिंग शुरू की गई। जिन अफ़सरान और आम फ़ौजियों को पहले से ट्रेनिंग हासिल थी, उन्हें नये भर्तीशुदा लोगों को ट्रेनिंग देने की ज़िम्मेदारी दी गई। ख़ुद मुझे फौज में सप्लाई और ट्रांसपोर्ट में काम करने वाले लोगों को ट्रेनिंग देने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई। अब मेरा ओहदा (रैंक) भी बढ़ा कर कैप्टन कर दिया गया। ग़रज़ कि 1943 साल आने तक हिंदुस्तान की सरज़मीं से बाहर हिंदुस्तान की जंगे आज़ादी लड़ने के लिए एक मुस्तैद और अनुशासित फ़ौज खड़ी कर के नेता जी सुभाष चंद्र बोस ने एक नामुमकिन काम को मुमकिन बना दिया। नेताजी में एक फ़ौजी कमांडर के सब गुण मौजूद थे। जापानी फ़ौजी अफ़सर भी पूरी दिलचस्पी से इस नई फ़ौज की ट्रेनिंग से ख़ुश थे कि उन्हें दुश्मन से लड़ने के लिये एक बेहतरीन फ़ौजी संगठन मिल गया था।


नेता जी ने जापानी वज़ीरे आज़म से यह तय कर लिया था कि हिंदुस्तान की सरहद पर दाख़िल होने पर जो इलाक़ा फ़तेह होगा उसका इंतज़ाम आज़ाद हिंद गवर्नमेंट करेगी। अब वक़्त आ गया था कि आज़ाद हिंद फ़ौज के लोग अपनी वतन परस्ती का सबूत पेश करते। सन् 1944 के शुरू में नेता जी ने आज़ाद हिंद फ़ौज के गांधी डिवीजन को रंगून से अराकान की तरफ़ कूच करने का हुक्म दिया। मैं भी इस डिवीजन के एक ब्रिगेड के साथ बतौर सप्लाई अफ़सर था। रंगून (बर्मा) में हिंदुस्तान के आख़िरी मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फर की क़ब्र के पास खड़े होकर उन्होंने इस डिवीजन के लोगों के सामने "ऑर्डर ऑफ दी डे" (Order of the Day) देकर अपनी फ़ौज का मनोबल बढ़ाते हुए कहा था - "ऐ हिंदुस्तान के बेताज बादशाह ज़ालिम अंग्रेज़ ने तुम्हें दफ़न होने के लिए दो गज़ ज़मीन भी वतने अज़ीज़ में नहीं दी। आज मुल्क़ से हज़ारों मील दूर आपको यहां बर्मा में दफ़न किया गया है। आप ख़ुदायेताला से दुआ करें कि हमारी यह फ़ौज उस साम्राजी हुक़ूमत (imperialism) से आपके अपमान का बदला ले सके। ये नौजवान हिंदुस्तान की उस आज़ादी के परवाने हैं जिसकी शमा आपने ख़ुद 1857 में दिल्ली के लालक़िले में रौशन की थी। आप हमें ताक़त दें कि हम उस लालक़िले पर आज़ादी का झंडा लहरा सकें।"


इस हुक्म को सुन कर हम लोगों के रोंगटे खड़े हो गए। दिलों में अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ नफ़रत का जज़्बा बढ़ गया। मातृभूमि पर मर-मिटने के लिए हर फ़ौजी का दिल जोश मारने लगा। इस तरह फ़रवरी 1944 में हम लोग बर्मा में हिंदुस्तान की पूर्वी सरहद की तरफ़ रवाना हुए। उस इलाक़े में अंग्रेज़ों ने तैंतीसवीं ब्रिटिश इंडियन कोर को जिस में तीन डिविजन फ़ौज थी, लगा रखी थी जो अराकान से कोहिमा तक फ़ैली हुई थी।