कोरोना से सबकी जान बचाने की कीमत बहुत है

जो सोच रहा था, वो हो रहा है। 


Herd immunity एक टर्म है। याने बीमारी कैसी भी हो, कुछ लोग बच ही जाते हैं। कोरोना से सबकी जान बचाने की कीमत बहुत है। सरेंडर कर दीजिए, जो मारे जाएंगे उनका किस्सा खत्म। जो बच जाएंगे, वो बच ही जाएंगे। @jay sushil ने इस पर लिखा है। ब्रिटेन में भी बहस है, यह लिंक भी देख सकते है


विश्व की सरकारें शायद इसी रणनीति पर चल रही हैं। कोरोना से मरने वाले उम्रदराज हैं,पेंशनखोर हैं, बोझ हैं। कुछ युवा भी जाएंगे।। मगर आबादी का डेढ़ दो परसेंट भी चला गया, तो फर्क नही पड़ता। यह संख्या कुछ करोड़ हों सकती है, मगर आबादी तो इस प्लेनेट पर कोई 600 करोड़ से अधिक है। क्या फर्क पड़ता है। जनसंख्या नियंत्रण कानून समझ लीजिए।


मगर कुछ करते दिखना है, तो लॉकडाउन वही आईवाश है। नॉन सिम्प्टोमेटिक कैरियर लाखों घूम रहे हैं, जिनमे बीमारी दिख गयी, आइसोलेट किया जा रहा है। जिसमे न दिखे, खुद तो इम्यून है, वो अनजाने में दूसरों तक पहुंचाने को जरिया है। जब लॉकडाउन खुलेगा, उनसे मिलने जुलने वाले फिर से इंफेक्टेड दिखेंगे। सँख्या बढ़ेगी, तो क्या फिर लॉकडाउन?


टेस्टिंग, और इलाज ही चारा है। मगर अरबो की टेस्टिंग कौन करे। लॉकडाउन का हुक्म देकर जिम्मेदारी जनता पर डाल दी गयी है। अब वो मर गयी, तो दोष, दुर्भाग्य भी अपना ही मानेगी। पूरी दुनिया सहमी है, उदास है। मगर हम मूर्खों का देश, इस रणनीति का जश्न मना रहा हैं। 


15 लाख लोग सिर्फ मार्च में विदेश से आये। हमने मरकज के तीन हजार की टेस्टिंग की, 300 से ऊपर पॉजिटीव आये। इसका 500 गुना लॉट हमारे शहरों, घरों, मोहल्ले में छुपा या फंसा है। यही रेशों ले लीजिए तो 15 लाख में 2 लाख पॉजिटीव होंगे। हम 3000 पहचाने जा चुके लोगो पर मजे ले रहे हैं। हमे फर्क नही पड़ता, इसलिए की हमारा मुद्दा करोना है ही। हमारा मुद्दा देशभक्ति है, संस्कृति है, मौजमस्ती है, धर्म है, नफरत है। जांच टेस्टिंग का अता पता नही, आप ताली-थाली-मोमबत्ती में मगन हैं। 


शायद आप फलाने की तरह सोचते हैं, सरकारों की तरह भी सोचते हैं। आपको भी शायद यही लगता है कि दादाजी/ पिताजी बोझ हैं। मर ही जायें तो ठीक। सम्भव है आप ऐसा सोचते है.. मगर मरने वालों में सौ के पीछे पांच दस युवा भी हैं। 


बेटे ने आज दिए जलाए होंगे। पटाखे भी छोड़े..  खुश रहिये। और कर भी क्या सकते हैं।


Manish Singh