सिंधिया घाट अब भी मणिकर्णिका से ठीक से नज़रें नहीं मिला सकता

एक अराजनीतिक और निर्वैयक्तिक पोस्ट


काशी में गंगा के तट पर भिनसरे घूमते हुए इस घाट के नाम पर नज़र टिक गई। ‘सिंधिया घाट’।


कवि कुमार मुकुल की किसी कविता की पंक्तियाँ बरबस याद हो आईं-


‘अशोक राजपथ, सिकन्दर लेन, शाहजहाँ पथ 
कभी पूरा मुल्क होता था 
जिन सम्राटों, शहंशाहों के नाम 
आज जोगा रहे हैं वो 
एक-एक सड़क।’


सिंधिया घाट के ठीक बगल में मणिकर्णिका घाट है। मोरोपंत तांबे ने काशी में ही जन्मी अपनी दुलारी बेटी का नाम मणिकर्णिका रखा था।


वही मणिकर्णिका आगे जाकर रानी लक्ष्मीबाई हो गईं और उनकी मृत्यु सिंधियाओं के दालान पर ग्वालियर के फूलबाग में जाकर हुई।


काशी अपने देहविलय के लिए सदेह ग्वालियर पहुँच गई थी। और ग्वालियर अपने शाही अवशेष को काशी पहुँचा आया होगा एक घाट जोहने के लिए।


लेकिन ऐसा संयोग कि ठीक मणिकर्णिका के बगल में?


मणिकर्णिका घाट पर जलती हुई चिताओं से एक खास तरह की गंध आती है। दहकती अग्निशिखा से झाँकते कालिख हो रहे पैरों को देखकर ऐसा लगता है मानो वह जीवन और मृत्यु का फलसफा समझा रहा हो।


सिंधिया घाट अब भी मणिकर्णिका से ठीक से नज़रें नहीं मिला सकता। क्योंकि इनके बीचोंबीच खड़ा है नक्काशीदार शिलाओं से निर्मित एक परित्यक्त-सा शिवाला।


वह शिवाला भी पीसा की झुकी हुई मीनार से कहीं अधिक झुकी हुई मुद्रा में मणिकर्णिका की ओर भूमि में धँसा जा रहा है।


सामने बह रही गंगा में भी एक ठहराव-सा दिखता है। क्षितिज पर चढ़ता हुआ सूरज जैसे ही अपनी रक्ताभ लालिमा को छोड़कर पूरे ताव में आता है, वैसे ही चिताओं की अग्निशिखाएँ अपनी आभा खोती जाती हैं।


काशी में ही पैदा हुए कबीर मानो गाए जा रहे हों-


साधो ये मुरदों का गाँव
पीर मरे पैगम्बर मरिहैं, मरिहैं जिन्दा जोगी
राजा मरिहैं परजा मरिहैं, मरिहैं बैद और रोगी
चंदा मरिहैं सूरज मरिहैं, मरिहैं धरणि अकासा
चौदहो भुवन के चौधरी मरिहैं, इन्हूं की का आसा
नौहूं मरिहैं दसहूं मरिहैं, मरिहैं सहज अठासी
तैंतीस कोट देवता मरिहैं, बड़ी काल की बाजी
नाम अनाम अनंत रहत है, दूजा तत्व न होई
कहत कबीर सुनो भाई साधो, भटक मरो मत कोई।


🙏 Avyakta


लेखक प्रसिद्ध गांधीवादी चिंतक है