राजद ने सभी समाजवादियों को किया हतप्रभ व निराश!

सामाजिक न्याय व गरीब गुरबों की आवाज बुलंद करने का दावा करनेवाली राजद ने सभी समाजवादियों को किया हतप्रभ व निराश!


वर्तमान परिदृश्य में जिस तरह से भाजपा गरीब-गुरबों की आवाज को कुचल रही है। इस परिदृश्य में सामाजिक न्याय व गरीब - गुरबों की बुलंद आवाज का देश की सबसे बड़ी पंचायत "संसद" में होना जरूरी हो गया है।



यहाँ मैं राज्ससभा चुनाव में राजद ने जिस तरह से सामाजिक न्याय व गरीब गुरबों का माखौल उड़ाया है वह चिंतनीय है। राजद के तरफ से दोनों उम्मीदवार का सामाजिक न्याय व वंचितों के उत्थान के लिये हुए और हो रहे संघर्षों में कोई योगदान हो यह राजनीतिक रूप से जागरूक लोग अच्छी तरह जानते हैं।


यहाँ मैं स्पष्ट कर दूँ, राज्यसभा का औचित्य इसलिये महत्वपूर्ण है कि दल अपने वरिष्ठ व तजुर्बेदार नेताओं (सीजन्ड पॉलिटिशियन) को अपने लोगों के हक-हकूक की आवाज बुलंद करने व देश को अपने तजुर्बे से लाभान्वित करने की क्षमता रखने वाले लोगों को भेजते हैं। पर राजद द्वारा भेजे गये एक भी उम्मीदवार से हम ना ही प्रदेश का और ना ही गरीब-गुरबों की आवाज बनने की अपेक्षा कर सकते हैं। साथ ही ना ही उनका सक्रिय राजनीति से दूर-दूर तक कोई सरोकार है। यह सामाजिक न्याय के साथ छल जैसा कार्यकलाप है।


यहाँ हम सभी उम्मीद कर रहे थे कि राजद स्वविवेक व स्वंय पहल करते हुए सामाजिक न्याय व वंचितों की बुलंद आवाज "लोकपुरुष श्री शरद यादव" को राज्यसभा भेजकर राज्सभा में सामाजिक न्याय व वंचितों के आवाज की शून्यता को भरेंगे।


पर दुर्भाग्य है उन्हें कुछ और दिख रहा है। शायद उनकी प्राथमिकता बदल गयी है।


श्री शरद यादव ने महागठबंधन बनाया। जिसका पूरे बिहार ने सिर-आँखों पर बैठाया और तीन-चौथाई से बहुमत देकर सरकार बनाया। यह एक संदेश था वंचितों का। कुछ समय बीतने पर महागठबंधन से जब नीतीश जी चोर दरवाजे से भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनायी तो उन्होंने (श्री शरद यादव) इसे जनादेश का अपमान बताया और अकेले अपनी पार्टी जदयू के निर्णय के विरुद्ध खड़ा हो गये। ये बात नीतीश जी को नागवार गुजरा और अपनी सहयोगी पार्टी भाजपा पर दबाव बनाकर असंवैधानिक तरीक़े से इनकी राज्यसभा की सदस्यता समाप्त करवा दिया। जबकि स्थापित परिपार्टी के अनुसार सदस्यता समाप्त होने की अनुशंसा उपराष्ट्रपति (सभापति, राज्यसभा) इथिक्स कमिटी और प्रिविलेज कमिटी को जाँच की रिपोर्ट पर करती है। यहाँ नीतीश की जबरदस्त चिरौरी के दबाव में सभापति महोदय ने असंवैधानिक निर्णय द्वारा सदस्यता समाप्त कर दी। अभी यह केश कोर्ट में निर्णयाधीन है।


इनका लगातार 46 वर्षों का सक्रिय राजनीतिक जीवन उपलब्धियों भड़ा पड़ा है। मंडल कमीशन को लागू करवाना और बिहार, उप्र, उडीसा, गुजरात, कर्नाटक और केरल में जनता दल की सरकार बनाने में अहम् किरदार निभाया। जिसका परिणाम है कि हिंदी पट्टी के बड़े सूबों बिहार और उत्तरप्रदेश में वंचित धरा सरकार और मुख्य विपक्षी दल के किरदार में रह रहे हैं।


महागठबंधन से जदयू के टूटने के बाद एनडीए के तरफ से मनाने का प्रयास भी किया कि सरकार में केबिनेट मंत्री का पद धारण कर मार्गदर्शन करने के आग्रह को भी इन्होंने ठुकराया। इनके आईडियोलॉजी से समझौता ना करना व सदैव वंचितों और सामाजिक न्याय की पैरोकारी की लगन हम सभी के लिये अनुकरणीय है।


आज सच्चाई है कि सदन में वंचितों की बुलंद आवाज की शून्यता है। इनका सदन में आना देशभर के तमाम वंचितों के हक-हकूक और अन्याय पर लोहिया जी के जैसे बेबाक आवाज बनते। आज देशभर में विपक्षी एकता का सबसे बड़ा चेहरा और एक कर पाने का दमखम रखनेवाले एकमात्र समाजवादी चेहरा हैं।


समाजवादी दलों का इसतरह का रवैया बिल्कुल निराशाजनक है। हमारे समझ से राजद का ऐसा रवैया वंचितों पर हमला है।


विचारधारा मानने वाले पथभ्रष्ट हो सकते हैं। पर विचारधारा हमेशा जवान व जिंदा रहती है। एक बेहतर और सशक्त समाजवादी धरा का पोषण हो, यह भी उनसे उम्मीद है।