मै आंदोलन मे नहीं - आंदोलन मेरे अंदर है 


1974 मे लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व मे शुरू हुए बिहार आंदोलन के समय 
हिन्दी कथा साहित्य के महत्त्वपूर्ण रचनाकार फणीश्वरनाथ 'रेणु' से लोगो ने  पूछा क्या आप भी आंदोलन मे शामिल है ? रेणु जी उत्तर दिया -- 'नहीं , आंदोलन मेरे अंदर है 'l


1975 में लागू आपातकाल का जे.पी. के साथ उन्होंने भी कड़ा विरोध किया। सत्ता के दमनचक्र के विरोध स्वरूप उन्होंने पद्मश्री की मानद उपाधि लौटा दी। उनको न सिर्फ़ आपात स्थिति के विरोध में सक्रिय हिस्सेदारी के लिए पुलिस यातना झेलनी पड़ी बल्कि जेल भी जाना पड़ा।  


 हिंदी कथा साहित्य में क्षेत्र विशेष की पीड़ा को देश की पीड़ा के रूप में पेश करने का जो अनूठा अंदाज रेणु ने अपनाया, वह अद्वितीय है। उन्होंने कथा साहित्य में 'आंचलिकता' को स्थापित किया। रेणु दमन और शोषण के विरुद्ध आजीवन संघर्ष करने वाले रचनाकार थे। 1942 के भारतीय स्वाधीनता-संग्राम और 1950 में नेपाली जनता को राणाशाही के दमन और अत्याचारों से मुक्ति दिलाने के लिए वहाँ की सशस्त्रा क्रान्ति और राजनीति में सक्रिय योगदान। 1952-53 में दीर्घकालीन रोगग्रस्तता। इसके बाद राजनीति की अपेक्षा साहित्य-सृजन की ओर अधिकाधिक झुकाव। 
 मैला आँचल, परती परिकथा, दीर्घतपा (उपन्यास); ठुमरी, अगिनखोर, आदिम रात्रि की महक, एक श्रावणी दोपहरी की धूप, सम्पूर्ण कहानियाँ (कहानी-संग्रह); ऋणजल धनजल, वन तुलसी की गन्ध, श्रुत-अश्रुत पूर्व (संस्मरण) तथा नेपाली क्रान्ति-कथा (रिपोर्ताज);आदि उनकी महत्वपूर्ण कृतियाँ: है l


उनकी कहानी 'मारे गए गुलफ़ाम' पर आधारित फ़िल्म 'तीसरी क़सम' ने भी उन्हें काफ़ी प्रसिद्धि दिलवाई। इस फ़िल्म में राजकपूर और वहीदा रहमान ने मुख्य भूमिका में अभिनय किया था। 'तीसरी क़सम' को बासु भट्टाचार्य ने निर्देशित किया था और इसके निर्माता सुप्रसिद्ध गीतकार शैलेन्द्र थे। यह फ़िल्म हिंदी सिनेमा में मील का पत्थर मानी जाती है।


आज 4 मार्च को रेणु जी का जन्मदिवस है l प्रणाम उन्हे l