काशी, कोशी और कुशी

ये कुशीनगर के इज़हार अंसारी हैं। इन्होंने गांधीजी को मधुबनी पेंटिंग के चटख रंगों में रंग दिया है। बापू के पैरों के आस-पास कोशी की मछलियाँ इठलाती हुई अठखेलियाँ कर रहीं हैं। और यह सब हो रहा है काशी में।


काहिवि (बीएचयू) के पटेल छात्रावास में गांधीजी के विचारों को जीवंत करनेवाली चित्रकारी का कार्यक्रम रखा गया। फाइन आर्ट्स में विधिवत रूप से प्रशिक्षित कई प्रतिभावान युवा कलाकारों ने होस्टल की दीवारों पर अपनी सारी रचनात्मकता उड़ेल दी। 


लेकिन इज़हार जैसे बिना किसी कला की डिग्री वाले कलाकार ने इसमें प्रथम स्थान प्राप्त किया।


ऐसा इसलिए संभव हो सका कि विश्वविद्यालय के उदार प्रशासकों ने इसे बाहर के भी इच्छुक प्रतिभागियों के लिए खुला रखा था। ‘विश्वविद्यालय’ शब्द ही अपने आप बोलता है कि उसमें वैश्विकता के स्तर की मुक्तता हो।


इज़हार ने अपने चित्र में गांधीजी के अहिंसा संबंधी विचारों को दर्शाया है। इसमें एक स्थान पर लिखा भी है- ‘अहिंसा परमो धर्मः’। इज़हार ने बातों-बातों में याद दिलाया कि वे स्वयं भी भगवान बुद्ध के महापरिनिर्वाण की स्थली कुशीनगर से आते हैं।


बायें हाथ से सधी हुई कूची चलानेवाले इज़हार को बधाइयाँ दीजिए।


भारतीयता की अविरल भावधारा में अहिंसा और करुणा का जल सदैव बहता रहे। प्रेम और मानवता की मछलियाँ इसमें निर्भीक अठखेलियाँ करतीं रहें। 🙏


अव्यक्त


प्रसिद्ध गांधीवादी विचारक