धर्म,ईश्वर और वामपंथ

धर्म और ईश्वर के बारे में सावधानी से सोचने और निर्णय लेने की ज़रूरत होती है !
सुनी-सुनाई और कुछ लोगों द्वारा कही गई बातों पर चलें तो मनुष्य अंतत: घोर पाखंड में फँसता जाता है ,जिसका ओर-छोर नहीं होता है ! केरल और पश्चिम बंगाल में वामपंथियों पार्टी जीतती रही ,तो क्या यहाँ से धर्म और ईश्वर का उन्मूलन हो गया ,बंगाल में जितनी पूजाएँ होती है ,उतनी शायद देश के किसी हिस्से में नहीं होती है ; केरल में चर्च के बोलबाले हैं ! त्रिपुरा का मुझे ठीक से पता नहीं है !
कहने का मतलब है कि क्या बंगाल और केरल में पूजा,ईश्वर और चर्च पर विश्वास रखनेवाली जनता और इन पार्टियों को जिताने वाली जनता अलग-अलग है !
धर्म और ईश्वर  की अवधारणाएँ जीवन से ओतप्रोत मिली हुई है और मनुष्य इनके साथ ही जीता है ,पाखंड की बात अलग है और धर्म और ईश्वर के साथ पाखंड भी जुड़ा है ,यह भी ठीक है !
तो सिर्फ धर्म को अफ़ीम कह कर बचा नहीं जा सकता ,या तो आप उसका कोई विकल्प दें ,या परिष्कार करें ,अन्यथा भूख और शोषण पर चलते रहने से ही आज वामपंथी टिके नहीं रह पाएँगे ।
या तो भूख और शोषण से निजात दिला पाते,लेकिन तब भी ईश्वर की ‘धारणाओं’ की सही व्याख्या करते जाना होगा,सिर्फ़ अफ़ीम कहने से तो और नशा होता है ॥


प्रमोद बेड़िया


लेखक प्रगतिशील विचारक एवं साहित्यकार हैं