व्यंग्य / सफल दांपत्य के सूत्र


(भगवान शिव से क्षमायाचना सहित)


आज महाशिवरात्रि है। भगवान शिव और देवी पार्वती के विवाह का उत्सव। हमारे देवताओं में सबसे सफल दांम्पत्य शिव और देवी पार्वती का ही मानते हैं। जब भी घर का वातावरण तनावग्रस्त होता है, मुझे भोले बाबा बेतरह याद आते हैं। अरसे से मन में बात थी कि मरने के बाद अगर बाबा से मिलना हुआ तो उनसे उनके सफल वैवाहिक जीवन का रहस्य अवश्य पूछूंगा। संयोग देखिए कि पिछली रात बीवी की डांट-डपट का दुख भुलाने के उद्धेश्य से भंग पीकर सोया नहीं कि भोले बाबा प्रकट हो गए। मैंने साष्टांग प्रणाम कर उनके आगे सीधे अपना प्रश्न रख दिया -'प्रभु, आपके सफल वैवाहिक जीवन का क्या रहस्य है ?' 
बाबा ने तनिक मुस्कुरा कर पूछा - 'बचवा, तेरा ब्याह हुआ है ?' 
मैंने ब्याह की अपनी भूल स्वीकार करते हुआ कहा - 'बाबा, सुना है कि हमारी जोड़ियां आप देवता लोग स्वर्ग से ही बनाकर भेजते हो। फिर ऐसा क्यों है कि हम मनुष्यों की जोड़ियां सामान्यतः बेमेल ही सिद्ध होती हैं ? मुझे आजतक कोई ऐसा जोड़ा नहीं मिला जो एक दूसरे से संतुष्ट हो। गड़बड़ आप लोगों की तकनीक में है और दंड पृथ्वी के हम निरीह प्राणी भोग रहे हैं।' 
मेरा इतना कहना था कि बाबा कुपित हो गए - दुष्ट मनुष्य, हम देवताओं ने तो स्त्री बनाकर भेजा पृथ्वी पर। तुम्हारी साथी और सहयोगी के रूप में। अपने अहंकार के वशीभूत तुमने उसे संपति बनाया, दासी बनाया, भोग्या बनाया और अंततः पत्नी बना दिया। अनंत काल तक तुमने उसे अपनी इच्छाओं से चलाया। अपनी व्यथाओं का बदला तो उसे देर-सबेर लेना ही था। तुम मनुष्यों ने स्वयं तो ब्याह की संस्था बनाकर अपने पांव पर कुल्हाड़ी मारी ही, मेरा, नारायण का और ब्रह्मदेव का भी ब्याह करवा दिया। तुम्हारी जोड़ियां हम देवताओं ने नहीं, हमारी जोड़ियां तुम मनुष्यों ने बनाई है। तुम तो फंसे ही दुष्चक्र में, हम त्रिदेव को भी फंसा दिया। यह तुम्हारी करनी का फल है जो तुम मनुष्य भी भोग रहे हो और हम देवता भी ।' 
मैंने पैर पकड़ कर बाबा से क्षमा-याचना की - ' क्षमा करें प्रभु, लेकिन अपने पूर्वजों की सहस्त्रों वर्ष पुरानी भूल का दंड यह मनुष्य जाति कब तक भुगतेगी ? इस दुष्चक्र से निकलने का कोई तो रास्ता होगा ?'
बाबा तनिक पसीजे। बोले - 'पगले, तुम्हारी ही रचना है मेरी पत्नी भी। उसके आए दिन की डांट-फटकार से मैं स्वयं भी हताशा और अवसाद में डूब जाता हूं। मैं भला क्या रास्ता बता सकता हूं तुम्हें ?' 
मैंने पूछा - 'प्रभु, अपना दुख भुलाने के लिए आप कुछ तो विधि अपनाते होगे ?' 
उन्होंने किंचित दुखी होकर कहा - 'भंग पी लेता हूं, पुत्र। इस भंग के प्रताप से देवी पार्वती कुछ भी बोलती रहे, मुझे कम ही सुनाई देता है। चेतना लौटने के बाद कुछ स्मरण भी नहीं रहता। आक्रोश अधिक बढ़ने पर जब वह चंडी का रूप धर लेती है तो मैं भंग के साथ अपने ब्रह्मास्त्र योग का प्रयोग कर लेता हूं। समाधि में न कुछ सुनाई देता है और न दिखाई।' 
कुछ पल चुप रहने के बाद बाबा ने पूछा - 'और कोई जिज्ञासा, बालक ?'
मैंने कहा - 'और कुछ नहीं, प्रभु ! मुझे अपनी समस्या का समाधान मिल गया।'


उधर भोलेनाथ अंतर्ध्यान हुए और इधर मेरी दृष्टि खुली। कमरे के बाहर से तीखा स्त्री-स्वर उठा तो मैं समझ गया कि घर में सुबह-सुबह वाकयुद्ध की रणभेरी बज चुकी है। लेकिन मन में आज भय का कहीं नामोनिशान नहीं था। मैंने मन ही मन भोले बाबा को हैप्पी एनीवर्सरी बोलकर निश्चिंत हो गया। मेरी आंखों के आगे भंग का गोला घूम रहा था और दिमाग में शिव जी की भूत-प्रेतों वाली बारात ।