तुम अपने काग़ज़ात कब दिखाओगे



कन्नड़ के युवा कवि और पत्रकार सिराज बिसरल्ली (43) द्वारा CAA-NRC के ख़िलाफ़ लिखी गयी चर्चित कन्नड़ कविता का हिन्दी अनुवाद. कर्नाटक के एक समारोह में इस कविता का पाठ करने के कारण पिछले मंगलवार को कवि को गिरफ़्तार कर लिया गया.


भारतीय जनता पार्टी के स्थानीय कार्यकर्ताओं द्वारा पुलिस में दर्ज़ करायी गयी शिक़ायत के बाद पुलिस ने कवि को आईपीसी की धारा 504 और 505 (B) के अन्तर्गत गिरफ़्तार कर लिया, हालांकि बाद में अदालत ने कवि को ज़मानत दे दी है.


शिक़ायतकर्ताओं के अनुसार इस कविता में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की खिल्ली उड़ायी गयी है, जबकि कवि ने इस बात से पूरी तरह इनकार किया है. जिस समय पुलिस कवि को गिरफ़्तार कर रही थी, कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री एच.डी. कुमारस्वामी इस कविता का कर्नाटक की विधानसभा में पाठ कर रहे थे.
पढ़िये कविता का हिन्दी अनुवाद :
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तुम अपने काग़ज़ात कब दिखाओगे
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आधार और राशन कार्ड की क़तारों में
अंगूठे के निशानों और सर्वर की मूर्खताओं के बीच
लोग खोते जा रहे हैं अपनी आजीविका
तुम, जो उनसे मांग रहे हो उनके काग़ज़ात
तुम अपने काग़ज़ात कब दिखाओगे?


हां तुम, जो फाड़ रहे हो पन्ने इतिहास के
उन लोगों के जिन्होंने कुरबान कर दी अपनी ज़िन्दगियां
देश को आज़ाद कराने के लिये
उन लोगों की शहादत के, जो शहीद हो गये,
जिनके नाम तक रह गये नामालूम
तुम अपने काग़ज़ात कब दिखाओगे?


तुम, जो मांग रहे हो काग़ज़ात ताज के
चार मीनार के, गुम्बज के
कुतुब मीनार और लाल किले के,
तुम अपने काग़ज़ात कब दिखाओगे?


अंग्रेजों के जूते चाटने वाले भंड़ुए
आज पी रहे हैं उन्मादी ख़ून धार्मिक घृणा का
ओ तुम, गोयबल्सों की औलादो,
तुम अपने काग़ज़ात कब दिखाओगे?


मेरे शहर में, जो बेचते हैं पकौड़े और चाय
जीवन-यापन के लिये, उन्होंने नहीं बेची अपनी इन्सानियत
नहीं बेचा अपना आत्म-सम्मान, नहीं बेचीं झूठी कहानियां
मुझे बताओ, तुम अपने काग़ज़ात कब दिखाओगे?


वे जिन्होंने हवा भरी पंक्चर टायरों में
और उन्हें लेकर आये सड़कों पर,
उन्होंने कभी नहीं बेचा अपने ईमान को
लेकिन तुम, जिसने बेच दिया मुल्क़ को
तुम अपने काग़ज़ात कब दिखाओगे?


तुम्हारे लिये, जिन्होंने धोखा दिया देशवासियों को,
काग़ज़ात में हेराफेरी करना कोई बड़ी बात नहीं
लेकिन, तुम काग़ज़ात कब दिखाओगे?
अपनी इन्सानियत के, अगर कहीं बची हो वह थोड़ी भी।


(अंग्रेज़ी से अनुवाद- राजेश चन्द्र, 21 फरवरी, 2020)


*When will you show your Documents*


-Siraj Bisaralli


In the queue of Aadhar and ration cards
With thumb impressions and foolery of servers
People are losing their livelihood
You, demanding their documents
When will you show your documents?


Hey you, tearing the pages of history
Of those who sacrificed their lives to free the nation
Of those martyred who wanted whose names went unknown
When will you show your documents?


You, demanding the papers of the Taj
Of the Char Minar, of the Gumbaz
Of the Qutub Minar and of the Red Fort,
When will you show your documents?


The pimps who boot-licked the British
Now drinking the intoxicated blood of religious hatred
You, the descendant of the Goebbels,
When will you show your documents?


In my town, those selling Pakoda and Tea
To make a living, haven’t sold their humanity
Haven’t sold their Self-esteem, haven’t sold falsified stories
Tell me, when will you show your documents?


Who pumped the punctured tires
And brought them on roads,
Never sold their selves
But you, who sold the nation
When will you show your documents?


For you, who deceived the countrymen,
Duping the papers is no big a deal
But, when will you show the documents?
Of humanity in you, if at all there is.


(गौरीलंकेशन्यूज़ डॉट कॉम से साभार.)


Rajesh Chandra