सार्थकता ढूढे

 


कभी कभी कुछ ऐसा मिल जाता है जो कीमत चुका कर भी नही मिल पाता है । जिन समुदायों में हम काम करते है वहां अंतहीन समस्याएं होती है ।  जिंदगी संघर्ष से भरी है, तकलीफें है, कई बार भूखे पेट भी सोना पड़ता है, बच्चे मिट्टी में खेल रहे होते है । सब जीवन का हिस्सा समझकर कभी कोई शिकायत नही करता । वे बहुत मस्त होते है  मन की अमीरी मत पूछो, आखों में उमीन्द की चमक व खुशियों का खजाना लुटाते मिल जाते है वे । जो मेरे लिए बहुत ही अनुकरणीय होता है ।


समाज का माध्यम वर्ग जिस तरह से भाग दौड़ की जिंदगी और पैसे कमाने की होड़ में सब कुछ छोड़ता जा रहा है जिससे जीवन का सकून खो रहा है । इससे रिश्तो की गरमाहट गायब हो गई है । इस सब से हमें क्या मिल रहा है और क्या कुछ खो रहा है समझ नही आ रहा है ।हम यदि सकून ढूढना चाहते है, खुश रहना चाहते है तो वर्ल्ड क्लास सिटी दिल्ली की विश्वस्तरीय बस्तियों में जाकर कुछ समय बिताये ।


समझ आएगा, जीवन कैसे चलता है । महीने में 3000 रुपयों से पूरे घर की खुशियाँ कैसे खरीदी जाती है । किसी छप्पर को कैसे महलों के सुख में तब्दील किया जाता है । कैसे विभिन्न धर्म व जातियों के लोग मिलकर एक दूसरे की खुशियाँ बांटते हुए समुदायों के निर्माण करते है । 


यह छपर में चल रही चाय की दुकान जीवन को गति देने का स्थान है  । इसलिए इस तस्वीर के मायने मेरे लिए सकारात्मक ऊर्जा देने वाला है ।


पुष्पा