मैं बे-पनाह अँधेरों को सुबह कैसे कहूँ,  मैं इन नज़ारों का अंधा तमाशबीन नहीं। (दुष्यंत कुमार)

दुष्यंत कुमार की इन लाइन्स से कुछ कहना चाहता हूं, महीनों बाद और बेहद दुख के साथ बेहद आहत।मन से और बेहद अफ़सोस के साथ (पश्चिमी अखबारों में छपी ख़बरों से)
मैं बे-पनाह अँधेरों को सुबह कैसे कहूँ, 
मैं इन नज़ारों का अंधा तमाशबीन नहीं।
(दुष्यंत कुमार)


कई दिन से मेरे आभासी दोस्त और छात्र कह रहे हैं कि "सर कुछ लिख नहीं रहे हैं इन दिनों" हालांकि पिछले एक महीने से ज़्यादा का अरसा गुज़रा प्रशासनिक ज़िम्मेदारियों में बेहद व्यस्त था लेकिन अनहोनी की आशंका एक ऐसे खौफ़ में जकड़ती जा रही थी उज़ दिन से जब जमिया पर प्रदर्शनकारियों को एक "नाबालिग"आततायी बंदूक़ ताने गोली चला रहा था और पुलिस हाथ बांधे खड़ी थी और शाहीन बाग़ में प्रदर्शन कर रही महिलाओं पर दो दिन गोली चलने की घटना हुई तभी से कुछ डर इस क़दर लगता था कि चाहते हुए भी कुछ लिखने का न दिल था और न शौक़ ही, जबकि डेढ़ महीने से मेरे संस्थान में कई महत्वपूर्ण समारोह, सम्मेलन और गोष्ठियां हुई थी जिनपर लिखा जाना चाहिए था।
लेकिन 3 दिनों पूर्व दिल्ली के उत्तरपूर्व हिस्से जैसी आग इंसानियत के जलने की देखीउस सदमे की सियाही चारो तरफ़ से वहशत के अंधेरों में जकड़ती गई। जहां ऐसी ऐसी कहानियां छन के आ रही हैं जिसका शीर्षक ही "रुद्राक्ष इज़ बेटर दैन पेन" या "शिश्न(Penis") ने बचा लिया"वो और भी कंपा देने वाला है बिल्कुल उसी तरह का जब 1984 में हम सब के सामने सरदारों की पहचान करके जलाया जा रहा था हम सब ने 2 3 सिख युवाओं को होस्टल में पनाह दी थी वैसा ही माहौल तसव्वर करके सिहरन होती है।भाजपा सत्ता में है, बहुमत में भी है पर उस पार्टी के प्रमुख हमारे भी प्रधानमंत्री हैं, गृहमंत्री भी हैं और पूरी सरकार ही हमारी है। तो क्या वो नही जानते हैं कि उनकी सरकार के मंत्रियों ने, सांसदों ने और कार्यकर्ताओं ने 2 महीने से शाहीन बाग़।में हो रहे अहिंसक प्रदर्शनकारियों के लिए जिस भाषा और जिस निम्नस्तर नफ़रत फैलानी वाली बातें कहीं हैं क्या वो हिंसा को बढ़ावा देने वाली नही थीं, गोली मारो सालों को, वो आपके घरों में घुस कर बहन बेटियों का रेप करेंगे, क्या देश भर में शाहीन बाग़ जैसे प्रदर्शन कारी नागरिक नही हैं क्या। योगी जी कहते हैं "ठोंके जाएंगे "उफ़्फ़। क्या ये राज्य के मुखिया की भाषा है। फिर 3 दिन तक निष्क्रिय और अकर्मण्य दिल्ली पुलिस क्यों मासूमो को क़त्ल और निर्मम हत्या होते हुए देखती रही। हिन्दू मुस्लिम के देश के युवा भविष्य अकाल मृत्यु की गोद मे बिना वजह के समा तो गए ही लेकिन उस से बड़ा ज़ख़्म है भरोसे का मर जाना एक दूसरे पर शक की निगाह रखना और जो लोग एक दूसरे के साथ कई दशकों से रह  रहे थे उन सबका संवेदन शून्य हो जाना।इसे बहाल करें , आपस मे मिलें जुलें, बात करें , गिले शिकवे करें और गले लगाएं क्योंकि साथ मे आपको ही रहना है न राजनीति ,न राजनेता न कोई और आपके साथ है। क्योंकि मतदान के बाद आपका रोल ख़त्म हो चुका है,और दर्द ग़म सहानुभूति, प्यार मुहब्बत, आपसी समझ बुझ और सारी मानवीय अनुभूतियां सिर्फ़ आपकी हैं।जिसकी हिफ़ाज़त और उसको मज़बूत रखने की ज़िम्मेदारी आपकी है सिर्फ़ आपकी।
क्योंकि इस भयंकर दंगे के बाद तनावपूर्ण माहौल में ऐसी ऐसी कहानियां रिस रिस के आ रही हैं जिन्होंने हिंदुस्तानियत, इंसानियत, मुहब्बत और सौहार्द्य के मद्धम होते चिराग़ में फिर से उम्मीद का तेल भर दिया है।
जय हिंद, जय हिंदुस्तान, 


ख़ुर्शीद