चले देश में देशी भाषा


मैं कई भाषाओं को डूबते हुए देख रहा हूँ l मेरा कार्यक्षेत्र आदिवासी अंचल रहा है l जहाँ मुख्यत: गौंड और कोरकू जनजाति निवास करती है l दोनों अपनी अपनी भाषा गोंडी और कोरकू बोलते रहे हैं जिसे वे लोग पारसी कहते है l दुःख इस बात का है कि इन दोनों जनजाति में अपनी भाषा बोलने वाले लोग कम और बहुत कम होते जा रहे हैं l नई पीढ़ी तो बिलकुल अनभिज्ञ है l बैतूल जिले में इन भाषाओं को बोलने वाले कुछ लोग मिल जाते हैं लेकिन होशंगाबाद जिले में ढूँढने पढ़ते है l आदिवासी बाहुल्य मंडला जिले में कुछ सयाने अपनी बोली भाषा जानते है बाकी वहां भी स्थिति चिन्ताजनक है l छिंदवाड़ा जिले के तामिया जैसे ब्लॉक में भी यही स्थिति है l एक भाषा के साथ भाषा से जुड़ा गीत ,संगीत ,लोकगीत ,लोकगाथा ,लोक संस्कृति ,सब कुछ ही दिन बाद विलुप्त होने के कगार पर है l आज विश्व मातृभाषा दिवस पर अपने देश प्रदेश की उन भाषाओं की चिंता के साथ जिनके बोलने और समझने वाले लगातार कम हो रहे है l


बोल की लब आज़ाद हैं तेरे...दुनिया की हर बोली, हर भाषा अपने में एक जीवन समेटे हैं!